ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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भावना करो कि “मेरी नस नस में बल, तेज, सामर्थ्य, निर्भयता, वीरता, क्षमा, शान्ति, आरोग्य, ब्रह्मचर्य प्रवेश कर रहे हैं, मैं उन्नति कर रहा हूँ” —ऐसा ख्याल करने से सचमुच आप ऐसे ही बन जाँगे।
“जल्दी सोना और जल्दी जागना”
नियम बारहवाँ:—
वक्तव्य:—जिन्हें वीर्यरत्ना करनी है और आरोग्यसम्पन्न तथा भाग्यवान् बनना है, उन्हें जल्दी सोने और जल्दी जागने का अभ्यास अवश्य ही डालना चाहिये। १० बजे के भीतर ही सोना चाहिये और ४ बजे के भीतर ही उठना चाहिये। क्योंकि स्वप्रदोष प्रायः रात्रि के अन्तिम ग्रह में ही हुआ करता है। वाल्यकाल नष्ट कर डालने से जैसे सम्पूर्ण जीवन दुःखमय हो जाता है, वैसे ही प्रातःकाल (दिन का वाल्यकाल) नष्ट कर डालने से भी सम्पूर्ण दिन दुःखमय बन जाता है। प्रातःकाल हो जाने पर भी जो पुरुष कुम्भकर्ण के समान खटिया पर पड़ा ही रहता है उसको पूरा अभागा समझना चाहिये। इतिहास और अनुभव हमें स्पष्ट बतलाता है कि प्रातःकाल उठने वाला पुरुष ही चंगा और भाग्यवान् हो सकता है। आज तक हमने प्रातःकाल में न उठने वाले किसी भी व्यक्ति को महा पुरुष होते हुए न देखा है और न सुना ही है। प्रकृति की ओर ध्यान देने से यही मालूम होता है कि प्रातःकाल ही में