भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 199 में से

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सम्पूर्ण रस भरा है। प्रातःकाल को 'अमृतवेला' कहते हैं। सच्च-मुच श्रुष्टि के इस प्रातःकालीन दिव्य अमृत को त्यागने वाला पुरुष जल्दी ही बूढ़ा व मृतक तुल्य हो जाता है। हमारे ऋषि मुनि इसी अमृत का सेवन नित्यशः ब्रह्ममुहूर्त में यथेष्ट सेवन कर इतने चंगे और चैतन्यमय बने हुए थे। रात भर के आराम के कारण प्रातःकाल में सम्पूर्ण शक्तियाँ अत्यन्त सतेज और वलिष्ठ रहती हैं। कठिन से कठिन काम भी उस समय सुगमतापूर्वक हो जाते हैं। ऋषि लोग ब्रह्ममुहूर्त में उठकर प्रथम सर्वशक्तिशाली परमात्मा का ध्यान करते थे, जिससे कि परमात्मा की शक्ति उनमें प्रवेश करती थी और बड़े बड़े राजा भी उनके सामने शिर मुकाते थे। यदि हम भी चाहते हैं कि हमारे सम्पूर्ण काम, क्रोधदि अन्तर्वाह्य शत्रु हमारे सामने शिर मुकावें और संसार में हमारी कीर्ति हो, तो हमें प्रातःकाल उठने का अभ्यास डालना ही चाहिये। एक जगह कहा है ““Early to bed and early to rise makes a man healthy, wealthy and wise”” यानी प्रातःकाल में उठने वाला मनुष्य आरोग्यवान, भाग्यवान और ज्ञानवान होता है—यह कथन अक्षर अक्षर सत्य है। देर में सोनेवाला और देर में उठने वाला पुरुष कभी भी ब्रह्मचारी विवेकी व भाग्यवान नहीं हो सकता। अतः जिन्हें पूर्वजों की तरह वीर्यवान, ज्ञानवान, सामर्थ्य-सम्पन्न बनना हो, उन्हें रोज ब्रह्ममुहूर्त में ही उठना चाहिये और सब से पहिले ईश्वर-चिन्तन करना चाहिये। क्योंकि प्रातःकाल में जो कुछ चिन्तन किया जाता है मनुष्य वैसा ही दिन भर बना रहता है। यदि आप प्रातःकाल क्रोध करके उठगे, तो दिन भर क्रोधी ही बने रहेंगे

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