भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ जल्दी सोना और जल्दी जागना ❁ [ १३३ ]

और यदि आप प्रसन्नतापूर्वक उठेंगे और 'पर स्त्री मात समान' ऐसा शुभचिन्तन करेंगे तो सब दिन प्रसन्नतापूर्वक बीतेगा, मन अत्यन्त पवित्र रहेगा और कोई हानि होने पर भी आप प्रसन्न ही रहेंगे। यदि रोज ही आप ईश्वर चिन्तन करके व प्रसन्नतापूर्वक उठेंगे तो दो ही साल में आपके जीवनचरित्र में जमीन आसमान का फरक दिखाई देगा। प्रत्यक्ष का प्रमाण क्या? करके देख लीजिये।

“निद्रा के शास्त्रीय नियम”

(१) जहाँ तक हो, खुली हवा में, प्रकाशमय जगह में, या खुले कमरे में सोना चाहिये; क्योंकि शुद्ध जल, हवा, स्थल, आकाश, प्रकाश ही प्राणिमात्र का जीवन है। जहाँ प्रकाश नहीं होता वहाँ रोग और दरिद्रता अवश्य होते हैं 'where there is no sun there is no health and wealth' (२) हर बक अकेले सोना चाहिये। इसी में ब्रह्मचर्य है। (३) ओढ़ने के कपड़े स्वच्छ, हल्के और सादे होने चाहिए। नरम-गरम विछाने से इन्द्रियाँ चुञ्च हो जाती हैं जिससे वे मन तन को विगाड़ डालती हैं। फिर अक्सर स्वप्रदोष होता है। (४) दुलाई, रज्जाई आदि 'महावस्त्र' फट जाने तक पानी का दर्शन नहीं कर पाते। धूल और गन्दगी से भरे हुये कपड़ों में हजारों रोग जन्तु होते हैं, जो कि स्वास्थ्य को खा डालते हैं। अतः ओढ़ने के, पहनने के, विछाने के सभी कपड़े सदा निर्मल रखने चाहिये। यदि कपड़े धोने लायक न हों तो धूप में डालना चाहिये। क्योंकि सूर्य के प्रकाश से रोग के सब जन्तु मर जाते हैं। ओढ़ने में मुँह ढाँक के कभी मत सोओ क्योंकि नाक, मुँह और अपान से