भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

हर दम जहर कार्वन निकला करता है जिससे कि मनुष्य निश्चय ही रोगी और अल्पायु बन जाता है। गन्दगी से जिन्दगी बरबाद होती है, यह सिद्धान्ततत्व सदा ध्यान में रखो। (६) आत्मोद्धार की इच्छा रखने वालों को जल्दी सोना और जल्दी उठना चाहिये। बारह बजे के पहले का एक घण्टा बारह बजे के बाद के तीन घण्टे के बराबर होता है। साढ़े छः घंटे से ज्यादा हरगिज न सोना चाहिये। अधिक सोने वाला कदापि स्वस्थ व महापुरुष नहीं हो सकता। महापुरुष कम सोने वाले और अधिक काम करने वाले ही हुआ करते हैं। रात्रि को खासकर विद्यार्थियों को ६ बजे ही सोना चाहिये और प्रातः काल ४ बजे भगवद्भ्राम्म स्मरण करते हुये उठना चाहिये। और विद्यौने को एक दम त्याग देना चाहिये, और शुद्ध जगह पर बैठ कर सब से पहले भगवद्भक्ति-चिन्तन, स्तुति वा पवित्र संकल्प करने चाहिये निस्सन्देह आप वैसे ही बन जावेगे।

(७) सोते वक्त दीपक को बुझा देना चाहिये क्योंकि वह स्वयं 'कार्वन' फैला कर हवा के प्राण को और हमारे जान को खा डालता है; तथा नाक मुँह और पेट को काजर की कोठरी बना देता है। (८) सोने के पहले और अन्त में जल पीना चाहिये और परमात्मा का ध्यान करते हुए सोना और उठना चाहिये। (९) निद्रा के पहले पेशाब अवश्य कर लेना चाहिये। जाड़ा या किसी कारण-दिशा, पेशाब को रोकना बड़ा भयानक है। इससे स्वप्न-दोष होता है। (१०) जब तक खूब नींद न आवे तब तक विद्यौने पर न लेटना चाहिये। विद्यौने पर फुजल पड़े पड़े जागते रहने की हालत में चित्त दुर्वासनाओं की तरफ दौड़ता है। (११) निद्रा के समय मन को