भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ जल्दी सोना और जल्दी जागना ❁

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संसारी भंभकों से अलग रखो। उच्च, शान्त और गम्भीर विचार जारी रखो। हृदय में ईश्वर का ध्यान व चिन्तन करो। तत्काल निद्रा आवेगी। निद्रा की चिन्ता करने से निद्रा नहीं आ सकती। (१२) थोड़ी सी दौड़ लगाने से तत्काल निद्रा आजायगी। (१३) निद्रा के समय शरीर पर कुछ भी कपड़े न रखने चाहिये। बहुत हुआ तो एक पतला कुर्ता काफी है। (१४) निद्रा के पहले खुले शरीर को खुली ठंड हवा से ठण्डा करने से निद्रा जल्दी आती है। विछौना को भी फटकारने से उसमें की गर्मी निकल जायगी और नींद बहुत जल्दी लग जायगी। (१५) घुटने तक पैर, कमर का सब भाग और शिर ठंडे जल से धोने और पोछने से निद्रा बड़े मजे में आती है और स्वप्नदोष भी नहीं होने पाता है। (१६) उठते समय नेत्र पर एकाएक प्रकाश न पड़े ऐसा करो। उठने के बाद हाथ धोकर ताम्र के पात्र का जल नेत्रों को लगाने से नेत्र-विकार सब दूर होते हैं और दृष्टि तेजस्वी होती है। (१७) निद्रा के कम से कम एक घण्टा पहले भोजन अवश्य कर लेना चाहिये। खाया और तुरन्त सोया, इसमें बुराई है। ऐसा करने से स्वप्नदोष के होने की अधिक सम्भावना रहती है। (१८) रात में बहुत हल्का भोजन करना चाहिये और नींबू, संतरा, दही, मूली, ककड़ी आदि तथा तेल के पदार्थ न खाने चाहिये। (१९) बहुत लोगों का ख्याल है कि “कपड़े बार बार धोने ही से जल्दी फटते हैं; परन्तु यह बात नहीं है। मैले होने ही से कपड़े, हाथ-पैर के मुआ-फिक, जल्दी फटते हैं। सारांश—कायिक, वाचिक और मानसिक स्वच्छता ही ब्रह्मचर्य वा दीर्घायु का रहस्य है।