भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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“प्राणायाम”

नियम तेरहवाँ:—

“प्राणो यत्र विलीयते मनस्तत्र विलीयते । मनोविलीयते यत्र प्राणस्तत्र विलीयते ॥”

—हठयोग

“प्राणों का लय ( या कुम्भक ) होने से मन का भी लय होता है अर्थात् मन भी स्थिर होता है और मन के लय होने से पंच प्राण भी स्थिर होते हैं, उनका लय होता है ।” श्रीमनु महाराज कहते हैं “जैसे अग्नि से धातुओं का मल नष्ट होता है वैसे ही प्राणायाम से मन और इन्द्रियाँ पवित्र व स्थिर होती हैं ।”

वक्तव्य:—प्राणायाम में इतनी प्रचंड शक्ति है कि उससे रोगी भी निरोगी और व्यभिचारी भी ब्रह्मचारी हो सकते हैं । इसी कारण भगवान् ने गीता के छठे अध्याय में इसका सुन्दर वर्णन किया है । प्राणायाम से ब्रह्मचर्य की उत्कृष्ट रक्षा होती है । प्राणायाम से आयु वृद्धि असीम होती है । अस्पायु भी दीर्घायु हो जाते हैं । प्राणायाम के तीन अंग हैं ( १ ) पूरक, ( २ ) रेचक और ( ३ ) कुम्भक ।

( १ ) पूरक—दाहिनी नासिका अंगूठे से दबाकर बाँयी से वायु भीतर खींचना और दोनों नासिकायें फिर बन्द किये रहना ।

( २ ) कुम्भक—भीतर की वायु जहाँ तक हो सके रोकना ।