भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 199 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 153

❁ प्राणायाम ❁

[ १३७ ]

( ३ ) रेचक—भीतर रोका हुआ वायु, दाहिनी नासिका खोलकर के और वार्यो नासिका को हाथ की आखिरी दो उँगलियों से दबाकर धीरे धीरे बाहर छोड़ना ।

जिससे वायु छोड़ा है उसी दाहिने नासा-छिद्र से फिर से वायु भीतर खींचना, पुनः पहिले की तरह नाक बन्द करके कुम्भक करना और अन्त में वाम नासा से रेचक करना । जिससे वायु बाहर छोड़ा जाता है उसी से वायु भीतर खींचकर प्राणायाम शुरू करना चाहिये । यह प्राणायाम का तत्व पूरा ध्यान में रखो ।

सिद्धासन*—नीचे बैठ कर बाँये पैर की एड़ी गुदा और इन्द्री के बीच में रखो और दाहिने पैर की एड़ी इन्द्री पर स्थापन करो और कमर विना मुकाये सीधे बैठ जाओ । यह सिद्धासन सम्पूर्ण चौरासी आसनों में सब से श्रेष्ठ आसन है । इससे मन व इन्द्रियाँ तत्काल शान्त हो जाती हैं ।

जब कभी चित्त में काम विकार उत्पन्न हो तो तत्काल सिद्धासन लगा कर सीधे बैठ जाओ और फौर्न प्राणायाम शुरू कर दो । मन में “भगवन्नामस्मरण” व “माँ माँ” इस पवित्र महामंत्र का जप, अथवा अन्य शुद्ध संकल्प करो । देखो, एक, दो ही कुम्भक में तुम्हारी सम्पूर्ण नीच इन्द्रियाँ और पापी-वासनायें तत्काल दब जायँगी और तुम बच जाओगे । यदि रास्ते में चलते समय कदा-चित् मन में कुकल्पनायें उठें तो तत्काल दोनों नासिकाओं से वायु खींचकर दम को रोको और खूब तेजी के साथ फौजी ढंग से चलो । रोका हुआ आस छोड़ते बक मुँह खोलकर छोड़ दो । ३-४ मरतवे ऐसा करने से तुम वेदांग बने रहोगे । परन्तु हाँ, दृष्टि को

*आसनो के लिये परिशिष्ट देखिये ।