भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

हर वक्त नीची ही अर्थात् नम्र ही रखना होगा व मन में ईश्वर वा मालु-नाम का पवित्र जप अवश्य करना होगा। निस्सन्देह तुम्हारा इसी जीवन में उद्धार होगा।

मामूली रबर की साइकिल जो सैकड़ों मील मनुष्य को विठलाकर ले जाती हैं सो किसके बल पर? कुम्भक ही के बल पर। इतनी बड़ी प्रचंड रेल भी कुम्भक ही के बल पर लाखों मन का लदा हुआ घोड़ा लिये हुये बिना दिक्कृत के चलाई जा रही है। कुम्भक ही के बल पर मनुष्य अथाह पानी में तैर कर पार चला जाता है। संक्षेप में कहा जाय तो यह सम्पूर्ण जगत् कुम्भक ही के बलपर कर्तव्य-तत्पर दिखाई दे रहा है। कुम्भक में सम्पूर्ण जगत् को हिलाने की शक्ति है। योगी लोग इस ईश्वरीय शक्ति को प्राणायाम के द्वारा अपने में अमर्यादिरूप से बढ़ाकर अजर अमरयानी अकाल मृत्यु न पानेवाले दीर्घजीवी हो जाते हैं, और भोगी लोग अपनी उस दैवी शक्तिको, काम के गुलाम बन नष्ट कर के स्वयं जर्जर और जीते जी ही मुदेँ बन जाते हैं। अतः जिन्हें दीर्घायु, निरोग, ब्रह्मचारी और सामर्थ्य-सम्पन्न बनना हो, उन्हें चाहिये कि “प्राणायाम की विधि” किसी योग्य पुरुष-द्वारा जल्दी से सीख लें। हमारे नित्यकर्म में जो “सन्ध्योपासन” रक्खा है उसमें ऋषि लोगों के कितने भारी उपकार हैं। परन्तु आजकल अङ्गरेजी पढ़े हुये कई अभागे लोग इस प्रचंड दैवीशक्ति के रहस्य-पूर्ण सन्ध्या को नहीं करते। वे संध्या की कुछ भी कीमत नहीं समझते। यह देश का महा दुर्भाग्य है। इसी कारण आज हमारी भी कुछ कीमत नहीं हो रही है। प्रभो! हमारे समस्त भाइयों की आँखें खोल दो और इस दैवी शक्ति का खजाना-संध्या युक्त