ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
पृष्ठ 155, कुल 199 में से
संदर्भ में पढ़ें❁ उपवास ❁
[ १३९ ]
प्राणायाम—उनके सुपुर्द कर दो। क्योंकि इसमें स्वार्थ और परमार्थ दोनों कूट कूट कर भरे हुये हैं !
“उपवास”
नियम चौदहवाँ :—
“आहारं पचाति शिखी दोषान् आहारवर्जितः ।”
—आयुर्वेद
“अग्नि आहार को पचाती है और उपवास दोषों को पचाता है अर्थात् नष्ट करता है ।”
जहाँ तक हो सकता है वहाँ तक हमारा शरीर बाहरी और भीतरी उपद्रवों से अपनी रक्षा आप ही कर लेता है। परन्तु मनुष्य जब शक्ति के बाहर खा लेता है अथवा कोई कार्य कर बैठता है, तब शरीर अंतर्वाह्य रोगी व दुर्बल बन जाता है। फिर वह अपनी रक्षा करने में असमर्थ हो जाता है। यदि उसे विश्रान्ति न दी जाय तो अन्त में वह जवाब दे देता है। “रोगी शरीर में रोगी मन” यह प्रकृति का सामान्य सिद्धान्त है; पापी वासनायें रोगी शरीर की सूचक हैं। स्वास्थ्य-पूर्ण शरीर में पापी वासनायें नहीं हो सकतीं। अतः स्वस्थ पुरुष को उपवास की कुछ भी जरूरत नहीं है; परन्तु ऐसे स्वस्थ अर्थात् तन मन से निर्मल पुरुष संसार में कितने होंगे? बहुत कम। इसी कारण संसार दुःखमय मालूम होता है।