भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

To be weak is a great sin; victory and happiness go to the strong. अर्थात् दुर्बल रहना यह एक महापाप है। सुख और यश वली ही को मिलते हैं। जिसकी आत्मा दुर्बल है, वही दुर्बल है। उपवास से आत्मा अत्यन्त ही निर्मल हो जाती है - मन और तन दोनों निरोग बन जाते हैं।

ऐसे दो मनुष्य लीजिये जिनकी पाचनशक्ति अति भोजन से विगड़ी हो। एक मनुष्य चूर्ण पाचक खाकर, अवलेह चाटकर और दवा की गोलियाँ और भी पेट में भर कर पेट को दुरुस्त कर रहा है और दूसरा मनुष्य एक दो दिन भोजन न करके रोज प्रातः स्नान, प्रातः सन्ध्या और रोज एक दो मील का चक्कर लगा के अपनी भूख को सुधार रहा है। अब कहिए, दोनों में कौन बुद्धिमान् है। सहीनों दवा खाकर अपने शरीर को भाड़े का टूटू बनानेवाला या उपवास और व्यायाम द्वारा अपने को दो ही दिन में चढ़ा करने वाला ?

उपवास से शारीरिक व मानसिक दोष जड़ से नष्ट हो जाते हैं और मनुष्य की आत्मशक्ति बहुत कुछ बढ़ जाती है। अतः ब्रह्मचर्य के लिये उपवास अत्यन्त ही फायदेमन्द है, क्योंकि उससे संपूर्ण नीच इन्द्रियाँ फीकी पड़ जाती हैं और मन पवित्र बन जाता है। इसी पवित्र दृष्टि से हमारे ऋषियों ने प्रति मास में दो उपवास (एकादशियाँ) रक्खे हैं, जो कि लोक और परलोक दोनों के लिये परम उपयोगी हैं।

परन्तु उपवास तब ही उपकारी हो सकता है जब कि केवल जल को छोड़कर दूसरी कोई भी चीज़ मुख में न डाली जाय। अत्यन्त नाज़ुक प्रकृतिवाले दूध अथवा शुद्ध फल को खा सकते