भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 199 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 157

❁ हृद-प्रतिज्ञा ❁

[ १४१ ]

हैं। फलाहार का मतलब यह नहीं कि उस दिन खूब मिठाई और तरह तरह का माल उड़ावें और पहले से भी अधिक रोगी और कामी बन जावें। ये सब मूर्ख और अभागों के काम हैं, भाग्यवान के नहीं।

उपवास का सच्चा अर्थ यह है:—उप यानी नजदीक और वास माने रहना, अर्थात् उपवास में परमात्मा के नजदीक रहना, और आत्म-शक्ति को ईश्वरपूजन और सद्ग्रन्थों के अवगण, मनन द्वारा बढ़ाना; न कि ताश, शतरंज, हँसी मजाक नाच, नाटक, सिनेमा आदि व्यर्थ व अनर्थकारी कामों में अपनी आत्मा का पतन करना। यदि महीने में दो एकादशी के दिन निराहार रह कर कोई उपर्युक्त “सच्चा उपवास” करने लग जाय, तो वह चारह वर्ष में एक अच्छा महात्मा हो सकता है। इसे आप स्वयं अनुभव करके देख लीजिये।

“हृद-प्रतिज्ञा”

नियम पन्द्रहवाँ:—

काया-वाचा-मनसा अपनी प्रतिज्ञा का पूर्ण पालन करना, यह एक परम श्रेष्ठ दैवी सद्गुण है; उससे मनुष्य में एक दैवी तेज प्रगट होता है व सम्पूर्ण लोग उस व्यक्ति का हृद विश्वास करने लगते हैं। प्रतिज्ञा-भंग करने वाला पुरुष नीच, आत्मघाती व दगावाज़ कहा जाता है; उस पर से लोगों की श्रद्धा उठ जाती है। “काम मर्दों का नहीं जो कि अधूरा करना, जो बात जवां से