भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 199 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 158

२४२.]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन ❁

निकाले उसे पूरा करना”—यह श्रेष्ठ पुरुषों का लक्षण है। प्रतिज्ञा-पालन करने वाले मर्द पुरुष होते हैं और प्रतिज्ञा तोड़ने वाले नामर्द पुरुष कहलाते हैं। सत्य-प्रतिज्ञ पुरुष अपने प्राण को भी त्याग देते हैं; परन्तु अपने वचन को कदापि नहीं त्याग सकते व कलंकभूत नहीं हो सकते हैं। “सुकृत जाय जो प्रण परिहरऊँ।” अपने किये हुये प्रण को तोड़ने से संचित पुण्य नष्ट हो जाता है। “प्राण जाय पर वचन न जाई”—यही महापुरुषों का लक्षण है और इसी में कीर्ति है व कीर्ति ही जीवन है। सत्यप्रतिज्ञ पुरुष के सामने सभी लोग शीश मुकाते हैं।

लुभाव से मुँह मोड़ना यद्यपि पहिले मरतवे सहज नहीं है तथापि वहाँ से तुरन्त हट जाने से अथवा उस लुभाव का ध्यान तथा चिन्तन करना ही छोड़ देने से और उसके बदले सुकर्म तथा शुभ चिन्तन में रत होने से मनुष्य उस लुभाव से निःस्सन्देह बच सकता है। यदि एक ही मरतवे मनुष्य इस प्रकार मनोनिग्रह करके दिखलावेगा, तो उसमें प्रतिकार करने की एक अद्वितीय दैवी शक्ति जागृत होगी; जिससे कि वह दूसरे मरतवे लुभाव से अपने मन को बड़ी आसानी से खींच सकेगा; तीसरे मरतवे और भी आसानी से, और इसी प्रकार दिन दिन उसकी वह पुरुषार्थ-शक्ति बढ़ती ही जायगी। इस प्रकार दस-आरह मरतवे मनोनिग्रह करने से उसमें ऐसा कुछ ईश्वरीय बल प्राप्त होगा कि जिसके सामर्थ्य से वह जो कुछ ठान लेगा वही कर दिखलायेगा। फिर वह श्रीभीष्म पितामह, श्रीलक्ष्मणजी, श्रीजनकजी आदि महापुरुषों की तरह लुभावपूर्ण परिस्थिति में रहते हुए भी अपने मन को विचलित नहीं होने देगा। अतः शुरु ही में अपनी शूरता