भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

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❁ दृढ़-प्रतिज्ञा ❁

[ १४३ ]

दिवलाओ । वस, यही पुरुषत्व एवं ईश्वरत्व प्राप्ति की सुवर्ण-कुञ्जी है । बुराई से बचना यह भलाई की ओर जाना है, इस महातत्व को हृदय में अखण्ड धारण किये रहो । कछुआ जैसे अपने अवयवों को अपनी ढाल के नीचे समेट लेता है उसी प्रकार अपनी इन्द्रियाँ भी घुरे कर्माँ से खींच कर शुभकर्माँ की ढाल के नीचे लानी चाहिए ।

देखो इस प्रकार इन्द्रियनिग्रह करने से तुम्हें क्या ही परमानन्द प्राप्त होता है । विषयानन्द से सच्चे आनन्द का नाश होता है व सर्वत्र दुःख ही दुःख उपजता है । ब्रह्मचारी पुरुष के सामने विषयी पुरुष फीके पड़ जाते हैं; और वे सुख शान्ति प्राप्ति के लिये उन्हीं की शरण में दौड़े चले आते हैं । हम भी यदि वीर्य को धारण करेंगे तो उन्हीं के सहस्र सच्चे आनन्दी, उत्साही और तेज-सम्पन्न महापुरुष बन सकते हैं । विषयसेवन से महापुरुष भी देखते ही देखते नीच पुरुष बन जाते हैं और विषय त्याग करने से नीच पुरुष भी निस्सन्देह महापुरुष बन जाते हैं । सारांश मनोनिग्रह ही पुण्य है वह मनोदास्य ही पाप है । अतः जितना अधिक हम मनोनिग्रह करेंगे उतने अधिक ध्येय, भाग्यवान और पुण्यवान हम निश्चयपूर्वक बन सकते हैं । “मन के हारे हार हैं, मन के जीते जीत” जो अपने को—अपने मन को—जीत लेता है वही पुरुष संपूर्ण जगत् को जीत लेता है ।

एक मरतवे के मनोनिग्रह से कहीं ऐसा न समझ बैठो कि “हम अब विषय पर हुकूमत चला सकते हैं ।” नहीं तो यह ख्याल तुम्हें भूल में मिला देगा । तुम्हें रोज मनोनिग्रह करना होगा और अपने मन तथा इन्द्रियों को अत्येक लुभाव से हठपूर्वक कछुआ