ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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भावना करो कि “मेरी नस नस में बल, तेज, सामर्थ्य, निर्भयता, वीरता, क्षमा, शान्ति, आरोग्य, ब्रह्मचर्य प्रवेश कर रहे हैं, मैं उन्नति कर रहा हूँ” —ऐसा ख्याल करने से सचमुच आप ऐसे ही बन जाँगे।
“जल्दी सोना और जल्दी जागना”
नियम बारहवाँ:—
वक्तव्य:—जिन्हें वीर्यरत्ना करनी है और आरोग्यसम्पन्न तथा भाग्यवान् बनना है, उन्हें जल्दी सोने और जल्दी जागने का अभ्यास अवश्य ही डालना चाहिये। १० बजे के भीतर ही सोना चाहिये और ४ बजे के भीतर ही उठना चाहिये। क्योंकि स्वप्रदोष प्रायः रात्रि के अन्तिम ग्रह में ही हुआ करता है। वाल्यकाल नष्ट कर डालने से जैसे सम्पूर्ण जीवन दुःखमय हो जाता है, वैसे ही प्रातःकाल (दिन का वाल्यकाल) नष्ट कर डालने से भी सम्पूर्ण दिन दुःखमय बन जाता है। प्रातःकाल हो जाने पर भी जो पुरुष कुम्भकर्ण के समान खटिया पर पड़ा ही रहता है उसको पूरा अभागा समझना चाहिये। इतिहास और अनुभव हमें स्पष्ट बतलाता है कि प्रातःकाल उठने वाला पुरुष ही चंगा और भाग्यवान् हो सकता है। आज तक हमने प्रातःकाल में न उठने वाले किसी भी व्यक्ति को महा पुरुष होते हुए न देखा है और न सुना ही है। प्रकृति की ओर ध्यान देने से यही मालूम होता है कि प्रातःकाल ही में
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सम्पूर्ण रस भरा है। प्रातःकाल को 'अमृतवेला' कहते हैं। सच्च-मुच श्रुष्टि के इस प्रातःकालीन दिव्य अमृत को त्यागने वाला पुरुष जल्दी ही बूढ़ा व मृतक तुल्य हो जाता है। हमारे ऋषि मुनि इसी अमृत का सेवन नित्यशः ब्रह्ममुहूर्त में यथेष्ट सेवन कर इतने चंगे और चैतन्यमय बने हुए थे। रात भर के आराम के कारण प्रातःकाल में सम्पूर्ण शक्तियाँ अत्यन्त सतेज और वलिष्ठ रहती हैं। कठिन से कठिन काम भी उस समय सुगमतापूर्वक हो जाते हैं। ऋषि लोग ब्रह्ममुहूर्त में उठकर प्रथम सर्वशक्तिशाली परमात्मा का ध्यान करते थे, जिससे कि परमात्मा की शक्ति उनमें प्रवेश करती थी और बड़े बड़े राजा भी उनके सामने शिर मुकाते थे। यदि हम भी चाहते हैं कि हमारे सम्पूर्ण काम, क्रोधदि अन्तर्वाह्य शत्रु हमारे सामने शिर मुकावें और संसार में हमारी कीर्ति हो, तो हमें प्रातःकाल उठने का अभ्यास डालना ही चाहिये। एक जगह कहा है ““Early to bed and early to rise makes a man healthy, wealthy and wise”” यानी प्रातःकाल में उठने वाला मनुष्य आरोग्यवान, भाग्यवान और ज्ञानवान होता है—यह कथन अक्षर अक्षर सत्य है। देर में सोनेवाला और देर में उठने वाला पुरुष कभी भी ब्रह्मचारी विवेकी व भाग्यवान नहीं हो सकता। अतः जिन्हें पूर्वजों की तरह वीर्यवान, ज्ञानवान, सामर्थ्य-सम्पन्न बनना हो, उन्हें रोज ब्रह्ममुहूर्त में ही उठना चाहिये और सब से पहिले ईश्वर-चिन्तन करना चाहिये। क्योंकि प्रातःकाल में जो कुछ चिन्तन किया जाता है मनुष्य वैसा ही दिन भर बना रहता है। यदि आप प्रातःकाल क्रोध करके उठगे, तो दिन भर क्रोधी ही बने रहेंगे
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और यदि आप प्रसन्नतापूर्वक उठेंगे और 'पर स्त्री मात समान' ऐसा शुभचिन्तन करेंगे तो सब दिन प्रसन्नतापूर्वक बीतेगा, मन अत्यन्त पवित्र रहेगा और कोई हानि होने पर भी आप प्रसन्न ही रहेंगे। यदि रोज ही आप ईश्वर चिन्तन करके व प्रसन्नतापूर्वक उठेंगे तो दो ही साल में आपके जीवनचरित्र में जमीन आसमान का फरक दिखाई देगा। प्रत्यक्ष का प्रमाण क्या? करके देख लीजिये।
“निद्रा के शास्त्रीय नियम”
(१) जहाँ तक हो, खुली हवा में, प्रकाशमय जगह में, या खुले कमरे में सोना चाहिये; क्योंकि शुद्ध जल, हवा, स्थल, आकाश, प्रकाश ही प्राणिमात्र का जीवन है। जहाँ प्रकाश नहीं होता वहाँ रोग और दरिद्रता अवश्य होते हैं 'where there is no sun there is no health and wealth' (२) हर बक अकेले सोना चाहिये। इसी में ब्रह्मचर्य है। (३) ओढ़ने के कपड़े स्वच्छ, हल्के और सादे होने चाहिए। नरम-गरम विछाने से इन्द्रियाँ चुञ्च हो जाती हैं जिससे वे मन तन को विगाड़ डालती हैं। फिर अक्सर स्वप्रदोष होता है। (४) दुलाई, रज्जाई आदि 'महावस्त्र' फट जाने तक पानी का दर्शन नहीं कर पाते। धूल और गन्दगी से भरे हुये कपड़ों में हजारों रोग जन्तु होते हैं, जो कि स्वास्थ्य को खा डालते हैं। अतः ओढ़ने के, पहनने के, विछाने के सभी कपड़े सदा निर्मल रखने चाहिये। यदि कपड़े धोने लायक न हों तो धूप में डालना चाहिये। क्योंकि सूर्य के प्रकाश से रोग के सब जन्तु मर जाते हैं। ओढ़ने में मुँह ढाँक के कभी मत सोओ क्योंकि नाक, मुँह और अपान से
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हर दम जहर कार्वन निकला करता है जिससे कि मनुष्य निश्चय ही रोगी और अल्पायु बन जाता है। गन्दगी से जिन्दगी बरबाद होती है, यह सिद्धान्ततत्व सदा ध्यान में रखो। (६) आत्मोद्धार की इच्छा रखने वालों को जल्दी सोना और जल्दी उठना चाहिये। बारह बजे के पहले का एक घण्टा बारह बजे के बाद के तीन घण्टे के बराबर होता है। साढ़े छः घंटे से ज्यादा हरगिज न सोना चाहिये। अधिक सोने वाला कदापि स्वस्थ व महापुरुष नहीं हो सकता। महापुरुष कम सोने वाले और अधिक काम करने वाले ही हुआ करते हैं। रात्रि को खासकर विद्यार्थियों को ६ बजे ही सोना चाहिये और प्रातः काल ४ बजे भगवद्भ्राम्म स्मरण करते हुये उठना चाहिये। और विद्यौने को एक दम त्याग देना चाहिये, और शुद्ध जगह पर बैठ कर सब से पहले भगवद्भक्ति-चिन्तन, स्तुति वा पवित्र संकल्प करने चाहिये निस्सन्देह आप वैसे ही बन जावेगे।
(७) सोते वक्त दीपक को बुझा देना चाहिये क्योंकि वह स्वयं 'कार्वन' फैला कर हवा के प्राण को और हमारे जान को खा डालता है; तथा नाक मुँह और पेट को काजर की कोठरी बना देता है। (८) सोने के पहले और अन्त में जल पीना चाहिये और परमात्मा का ध्यान करते हुए सोना और उठना चाहिये। (९) निद्रा के पहले पेशाब अवश्य कर लेना चाहिये। जाड़ा या किसी कारण-दिशा, पेशाब को रोकना बड़ा भयानक है। इससे स्वप्न-दोष होता है। (१०) जब तक खूब नींद न आवे तब तक विद्यौने पर न लेटना चाहिये। विद्यौने पर फुजल पड़े पड़े जागते रहने की हालत में चित्त दुर्वासनाओं की तरफ दौड़ता है। (११) निद्रा के समय मन को
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संसारी भंभकों से अलग रखो। उच्च, शान्त और गम्भीर विचार जारी रखो। हृदय में ईश्वर का ध्यान व चिन्तन करो। तत्काल निद्रा आवेगी। निद्रा की चिन्ता करने से निद्रा नहीं आ सकती। (१२) थोड़ी सी दौड़ लगाने से तत्काल निद्रा आजायगी। (१३) निद्रा के समय शरीर पर कुछ भी कपड़े न रखने चाहिये। बहुत हुआ तो एक पतला कुर्ता काफी है। (१४) निद्रा के पहले खुले शरीर को खुली ठंड हवा से ठण्डा करने से निद्रा जल्दी आती है। विछौना को भी फटकारने से उसमें की गर्मी निकल जायगी और नींद बहुत जल्दी लग जायगी। (१५) घुटने तक पैर, कमर का सब भाग और शिर ठंडे जल से धोने और पोछने से निद्रा बड़े मजे में आती है और स्वप्नदोष भी नहीं होने पाता है। (१६) उठते समय नेत्र पर एकाएक प्रकाश न पड़े ऐसा करो। उठने के बाद हाथ धोकर ताम्र के पात्र का जल नेत्रों को लगाने से नेत्र-विकार सब दूर होते हैं और दृष्टि तेजस्वी होती है। (१७) निद्रा के कम से कम एक घण्टा पहले भोजन अवश्य कर लेना चाहिये। खाया और तुरन्त सोया, इसमें बुराई है। ऐसा करने से स्वप्नदोष के होने की अधिक सम्भावना रहती है। (१८) रात में बहुत हल्का भोजन करना चाहिये और नींबू, संतरा, दही, मूली, ककड़ी आदि तथा तेल के पदार्थ न खाने चाहिये। (१९) बहुत लोगों का ख्याल है कि “कपड़े बार बार धोने ही से जल्दी फटते हैं; परन्तु यह बात नहीं है। मैले होने ही से कपड़े, हाथ-पैर के मुआ-फिक, जल्दी फटते हैं। सारांश—कायिक, वाचिक और मानसिक स्वच्छता ही ब्रह्मचर्य वा दीर्घायु का रहस्य है।
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“प्राणायाम”
नियम तेरहवाँ:—
“प्राणो यत्र विलीयते मनस्तत्र विलीयते । मनोविलीयते यत्र प्राणस्तत्र विलीयते ॥”
—हठयोग
“प्राणों का लय ( या कुम्भक ) होने से मन का भी लय होता है अर्थात् मन भी स्थिर होता है और मन के लय होने से पंच प्राण भी स्थिर होते हैं, उनका लय होता है ।” श्रीमनु महाराज कहते हैं “जैसे अग्नि से धातुओं का मल नष्ट होता है वैसे ही प्राणायाम से मन और इन्द्रियाँ पवित्र व स्थिर होती हैं ।”
वक्तव्य:—प्राणायाम में इतनी प्रचंड शक्ति है कि उससे रोगी भी निरोगी और व्यभिचारी भी ब्रह्मचारी हो सकते हैं । इसी कारण भगवान् ने गीता के छठे अध्याय में इसका सुन्दर वर्णन किया है । प्राणायाम से ब्रह्मचर्य की उत्कृष्ट रक्षा होती है । प्राणायाम से आयु वृद्धि असीम होती है । अस्पायु भी दीर्घायु हो जाते हैं । प्राणायाम के तीन अंग हैं ( १ ) पूरक, ( २ ) रेचक और ( ३ ) कुम्भक ।
( १ ) पूरक—दाहिनी नासिका अंगूठे से दबाकर बाँयी से वायु भीतर खींचना और दोनों नासिकायें फिर बन्द किये रहना ।
( २ ) कुम्भक—भीतर की वायु जहाँ तक हो सके रोकना ।
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( ३ ) रेचक—भीतर रोका हुआ वायु, दाहिनी नासिका खोलकर के और वार्यो नासिका को हाथ की आखिरी दो उँगलियों से दबाकर धीरे धीरे बाहर छोड़ना ।
जिससे वायु छोड़ा है उसी दाहिने नासा-छिद्र से फिर से वायु भीतर खींचना, पुनः पहिले की तरह नाक बन्द करके कुम्भक करना और अन्त में वाम नासा से रेचक करना । जिससे वायु बाहर छोड़ा जाता है उसी से वायु भीतर खींचकर प्राणायाम शुरू करना चाहिये । यह प्राणायाम का तत्व पूरा ध्यान में रखो ।
सिद्धासन*—नीचे बैठ कर बाँये पैर की एड़ी गुदा और इन्द्री के बीच में रखो और दाहिने पैर की एड़ी इन्द्री पर स्थापन करो और कमर विना मुकाये सीधे बैठ जाओ । यह सिद्धासन सम्पूर्ण चौरासी आसनों में सब से श्रेष्ठ आसन है । इससे मन व इन्द्रियाँ तत्काल शान्त हो जाती हैं ।
जब कभी चित्त में काम विकार उत्पन्न हो तो तत्काल सिद्धासन लगा कर सीधे बैठ जाओ और फौर्न प्राणायाम शुरू कर दो । मन में “भगवन्नामस्मरण” व “माँ माँ” इस पवित्र महामंत्र का जप, अथवा अन्य शुद्ध संकल्प करो । देखो, एक, दो ही कुम्भक में तुम्हारी सम्पूर्ण नीच इन्द्रियाँ और पापी-वासनायें तत्काल दब जायँगी और तुम बच जाओगे । यदि रास्ते में चलते समय कदा-चित् मन में कुकल्पनायें उठें तो तत्काल दोनों नासिकाओं से वायु खींचकर दम को रोको और खूब तेजी के साथ फौजी ढंग से चलो । रोका हुआ आस छोड़ते बक मुँह खोलकर छोड़ दो । ३-४ मरतवे ऐसा करने से तुम वेदांग बने रहोगे । परन्तु हाँ, दृष्टि को
*आसनो के लिये परिशिष्ट देखिये ।
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हर वक्त नीची ही अर्थात् नम्र ही रखना होगा व मन में ईश्वर वा मालु-नाम का पवित्र जप अवश्य करना होगा। निस्सन्देह तुम्हारा इसी जीवन में उद्धार होगा।
मामूली रबर की साइकिल जो सैकड़ों मील मनुष्य को विठलाकर ले जाती हैं सो किसके बल पर? कुम्भक ही के बल पर। इतनी बड़ी प्रचंड रेल भी कुम्भक ही के बल पर लाखों मन का लदा हुआ घोड़ा लिये हुये बिना दिक्कृत के चलाई जा रही है। कुम्भक ही के बल पर मनुष्य अथाह पानी में तैर कर पार चला जाता है। संक्षेप में कहा जाय तो यह सम्पूर्ण जगत् कुम्भक ही के बलपर कर्तव्य-तत्पर दिखाई दे रहा है। कुम्भक में सम्पूर्ण जगत् को हिलाने की शक्ति है। योगी लोग इस ईश्वरीय शक्ति को प्राणायाम के द्वारा अपने में अमर्यादिरूप से बढ़ाकर अजर अमरयानी अकाल मृत्यु न पानेवाले दीर्घजीवी हो जाते हैं, और भोगी लोग अपनी उस दैवी शक्तिको, काम के गुलाम बन नष्ट कर के स्वयं जर्जर और जीते जी ही मुदेँ बन जाते हैं। अतः जिन्हें दीर्घायु, निरोग, ब्रह्मचारी और सामर्थ्य-सम्पन्न बनना हो, उन्हें चाहिये कि “प्राणायाम की विधि” किसी योग्य पुरुष-द्वारा जल्दी से सीख लें। हमारे नित्यकर्म में जो “सन्ध्योपासन” रक्खा है उसमें ऋषि लोगों के कितने भारी उपकार हैं। परन्तु आजकल अङ्गरेजी पढ़े हुये कई अभागे लोग इस प्रचंड दैवीशक्ति के रहस्य-पूर्ण सन्ध्या को नहीं करते। वे संध्या की कुछ भी कीमत नहीं समझते। यह देश का महा दुर्भाग्य है। इसी कारण आज हमारी भी कुछ कीमत नहीं हो रही है। प्रभो! हमारे समस्त भाइयों की आँखें खोल दो और इस दैवी शक्ति का खजाना-संध्या युक्त
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प्राणायाम—उनके सुपुर्द कर दो। क्योंकि इसमें स्वार्थ और परमार्थ दोनों कूट कूट कर भरे हुये हैं !
“उपवास”
नियम चौदहवाँ :—
“आहारं पचाति शिखी दोषान् आहारवर्जितः ।”
—आयुर्वेद
“अग्नि आहार को पचाती है और उपवास दोषों को पचाता है अर्थात् नष्ट करता है ।”
जहाँ तक हो सकता है वहाँ तक हमारा शरीर बाहरी और भीतरी उपद्रवों से अपनी रक्षा आप ही कर लेता है। परन्तु मनुष्य जब शक्ति के बाहर खा लेता है अथवा कोई कार्य कर बैठता है, तब शरीर अंतर्वाह्य रोगी व दुर्बल बन जाता है। फिर वह अपनी रक्षा करने में असमर्थ हो जाता है। यदि उसे विश्रान्ति न दी जाय तो अन्त में वह जवाब दे देता है। “रोगी शरीर में रोगी मन” यह प्रकृति का सामान्य सिद्धान्त है; पापी वासनायें रोगी शरीर की सूचक हैं। स्वास्थ्य-पूर्ण शरीर में पापी वासनायें नहीं हो सकतीं। अतः स्वस्थ पुरुष को उपवास की कुछ भी जरूरत नहीं है; परन्तु ऐसे स्वस्थ अर्थात् तन मन से निर्मल पुरुष संसार में कितने होंगे? बहुत कम। इसी कारण संसार दुःखमय मालूम होता है।
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To be weak is a great sin; victory and happiness go to the strong. अर्थात् दुर्बल रहना यह एक महापाप है। सुख और यश वली ही को मिलते हैं। जिसकी आत्मा दुर्बल है, वही दुर्बल है। उपवास से आत्मा अत्यन्त ही निर्मल हो जाती है - मन और तन दोनों निरोग बन जाते हैं।
ऐसे दो मनुष्य लीजिये जिनकी पाचनशक्ति अति भोजन से विगड़ी हो। एक मनुष्य चूर्ण पाचक खाकर, अवलेह चाटकर और दवा की गोलियाँ और भी पेट में भर कर पेट को दुरुस्त कर रहा है और दूसरा मनुष्य एक दो दिन भोजन न करके रोज प्रातः स्नान, प्रातः सन्ध्या और रोज एक दो मील का चक्कर लगा के अपनी भूख को सुधार रहा है। अब कहिए, दोनों में कौन बुद्धिमान् है। सहीनों दवा खाकर अपने शरीर को भाड़े का टूटू बनानेवाला या उपवास और व्यायाम द्वारा अपने को दो ही दिन में चढ़ा करने वाला ?
उपवास से शारीरिक व मानसिक दोष जड़ से नष्ट हो जाते हैं और मनुष्य की आत्मशक्ति बहुत कुछ बढ़ जाती है। अतः ब्रह्मचर्य के लिये उपवास अत्यन्त ही फायदेमन्द है, क्योंकि उससे संपूर्ण नीच इन्द्रियाँ फीकी पड़ जाती हैं और मन पवित्र बन जाता है। इसी पवित्र दृष्टि से हमारे ऋषियों ने प्रति मास में दो उपवास (एकादशियाँ) रक्खे हैं, जो कि लोक और परलोक दोनों के लिये परम उपयोगी हैं।
परन्तु उपवास तब ही उपकारी हो सकता है जब कि केवल जल को छोड़कर दूसरी कोई भी चीज़ मुख में न डाली जाय। अत्यन्त नाज़ुक प्रकृतिवाले दूध अथवा शुद्ध फल को खा सकते
❁ हृद-प्रतिज्ञा ❁
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हैं। फलाहार का मतलब यह नहीं कि उस दिन खूब मिठाई और तरह तरह का माल उड़ावें और पहले से भी अधिक रोगी और कामी बन जावें। ये सब मूर्ख और अभागों के काम हैं, भाग्यवान के नहीं।
उपवास का सच्चा अर्थ यह है:—उप यानी नजदीक और वास माने रहना, अर्थात् उपवास में परमात्मा के नजदीक रहना, और आत्म-शक्ति को ईश्वरपूजन और सद्ग्रन्थों के अवगण, मनन द्वारा बढ़ाना; न कि ताश, शतरंज, हँसी मजाक नाच, नाटक, सिनेमा आदि व्यर्थ व अनर्थकारी कामों में अपनी आत्मा का पतन करना। यदि महीने में दो एकादशी के दिन निराहार रह कर कोई उपर्युक्त “सच्चा उपवास” करने लग जाय, तो वह चारह वर्ष में एक अच्छा महात्मा हो सकता है। इसे आप स्वयं अनुभव करके देख लीजिये।
“हृद-प्रतिज्ञा”
नियम पन्द्रहवाँ:—
काया-वाचा-मनसा अपनी प्रतिज्ञा का पूर्ण पालन करना, यह एक परम श्रेष्ठ दैवी सद्गुण है; उससे मनुष्य में एक दैवी तेज प्रगट होता है व सम्पूर्ण लोग उस व्यक्ति का हृद विश्वास करने लगते हैं। प्रतिज्ञा-भंग करने वाला पुरुष नीच, आत्मघाती व दगावाज़ कहा जाता है; उस पर से लोगों की श्रद्धा उठ जाती है। “काम मर्दों का नहीं जो कि अधूरा करना, जो बात जवां से
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निकाले उसे पूरा करना”—यह श्रेष्ठ पुरुषों का लक्षण है। प्रतिज्ञा-पालन करने वाले मर्द पुरुष होते हैं और प्रतिज्ञा तोड़ने वाले नामर्द पुरुष कहलाते हैं। सत्य-प्रतिज्ञ पुरुष अपने प्राण को भी त्याग देते हैं; परन्तु अपने वचन को कदापि नहीं त्याग सकते व कलंकभूत नहीं हो सकते हैं। “सुकृत जाय जो प्रण परिहरऊँ।” अपने किये हुये प्रण को तोड़ने से संचित पुण्य नष्ट हो जाता है। “प्राण जाय पर वचन न जाई”—यही महापुरुषों का लक्षण है और इसी में कीर्ति है व कीर्ति ही जीवन है। सत्यप्रतिज्ञ पुरुष के सामने सभी लोग शीश मुकाते हैं।
लुभाव से मुँह मोड़ना यद्यपि पहिले मरतवे सहज नहीं है तथापि वहाँ से तुरन्त हट जाने से अथवा उस लुभाव का ध्यान तथा चिन्तन करना ही छोड़ देने से और उसके बदले सुकर्म तथा शुभ चिन्तन में रत होने से मनुष्य उस लुभाव से निःस्सन्देह बच सकता है। यदि एक ही मरतवे मनुष्य इस प्रकार मनोनिग्रह करके दिखलावेगा, तो उसमें प्रतिकार करने की एक अद्वितीय दैवी शक्ति जागृत होगी; जिससे कि वह दूसरे मरतवे लुभाव से अपने मन को बड़ी आसानी से खींच सकेगा; तीसरे मरतवे और भी आसानी से, और इसी प्रकार दिन दिन उसकी वह पुरुषार्थ-शक्ति बढ़ती ही जायगी। इस प्रकार दस-आरह मरतवे मनोनिग्रह करने से उसमें ऐसा कुछ ईश्वरीय बल प्राप्त होगा कि जिसके सामर्थ्य से वह जो कुछ ठान लेगा वही कर दिखलायेगा। फिर वह श्रीभीष्म पितामह, श्रीलक्ष्मणजी, श्रीजनकजी आदि महापुरुषों की तरह लुभावपूर्ण परिस्थिति में रहते हुए भी अपने मन को विचलित नहीं होने देगा। अतः शुरु ही में अपनी शूरता
❁ दृढ़-प्रतिज्ञा ❁
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दिवलाओ । वस, यही पुरुषत्व एवं ईश्वरत्व प्राप्ति की सुवर्ण-कुञ्जी है । बुराई से बचना यह भलाई की ओर जाना है, इस महातत्व को हृदय में अखण्ड धारण किये रहो । कछुआ जैसे अपने अवयवों को अपनी ढाल के नीचे समेट लेता है उसी प्रकार अपनी इन्द्रियाँ भी घुरे कर्माँ से खींच कर शुभकर्माँ की ढाल के नीचे लानी चाहिए ।
देखो इस प्रकार इन्द्रियनिग्रह करने से तुम्हें क्या ही परमानन्द प्राप्त होता है । विषयानन्द से सच्चे आनन्द का नाश होता है व सर्वत्र दुःख ही दुःख उपजता है । ब्रह्मचारी पुरुष के सामने विषयी पुरुष फीके पड़ जाते हैं; और वे सुख शान्ति प्राप्ति के लिये उन्हीं की शरण में दौड़े चले आते हैं । हम भी यदि वीर्य को धारण करेंगे तो उन्हीं के सहस्र सच्चे आनन्दी, उत्साही और तेज-सम्पन्न महापुरुष बन सकते हैं । विषयसेवन से महापुरुष भी देखते ही देखते नीच पुरुष बन जाते हैं और विषय त्याग करने से नीच पुरुष भी निस्सन्देह महापुरुष बन जाते हैं । सारांश मनोनिग्रह ही पुण्य है वह मनोदास्य ही पाप है । अतः जितना अधिक हम मनोनिग्रह करेंगे उतने अधिक ध्येय, भाग्यवान और पुण्यवान हम निश्चयपूर्वक बन सकते हैं । “मन के हारे हार हैं, मन के जीते जीत” जो अपने को—अपने मन को—जीत लेता है वही पुरुष संपूर्ण जगत् को जीत लेता है ।
एक मरतवे के मनोनिग्रह से कहीं ऐसा न समझ बैठो कि “हम अब विषय पर हुकूमत चला सकते हैं ।” नहीं तो यह ख्याल तुम्हें भूल में मिला देगा । तुम्हें रोज मनोनिग्रह करना होगा और अपने मन तथा इन्द्रियों को अत्येक लुभाव से हठपूर्वक कछुआ
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
की तरह खींचना होगा। इसी में पुरुषार्थ है ! इसी में कीर्ति है !! और इसी में ब्रह्मचर्य की रक्षा है !!! प्रतिज्ञा का स्मारक रखो। (इस ग्रन्थ का “मन व इन्द्रियां” यह प्रकरण बार बार पढ़ो और रोज पढ़ो)।
“डायरी”
नियम सोलहवाः—
“स्मरण वही” अथवा Diary यह एक मनुष्य का सब से घनिष्ट मित्र है। उसके पास हम जो चाहे सो जी खोल के बोल सकते हैं। यदि आपको आत्म-सुधार करना हो तो रोज दिन भर के भले घुरे कार्यों का वर्णन डायरी में ज्यों का त्यों लिखा करो और सोते समय उस पर गंभीर विचार किया करो, जिससे कि मनुष्य की श्रेष्ठता का तथा नीचता का परिचय भली भाँति हो जाय और उसको अपने कर्मों के लिए हर्ष व पछतावा होकर, वह श्रेष्ठ पुरुषों के समान बनने के लिये कटिबद्ध हो जाय। प्रत्येक मास के अनन्तर दोष और गुण की सूची लिखा करोगे तो उसे अवलोकन करने में बहुत ही सुभीता तथा कल्याण होगा।
डायरी के लिखने से मनुष्य में सत्य का संचार होता है, आत्म-सुधार का दृढ़-संकल्प हठात् घुस जाता है, समय का आदर होने लगता है, नियमितता शरीर में भिन जाती है और आत्म-विश्वास के साथ ही साथ आत्मिक-बल भी बढ़ने लगता है।
“दूसरों के दोष देखने से मनुष्य दोषी बनता है और अपने
डायरी
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दोष देखने से वह पवित्र बन जाता है।” दूसरों के दोष देखने के वनिस्वत—जो कि पतन का मूल है—यदि मनुष्य अपने ही दोष देखा करेगा तो उसका उद्धार इसी जन्म में हो सकता है। महा पुरुष कहते हैं:—
यथाहि निपुणः सम्यक् परदोषेक्षणं प्रति । तथाचेन्नपुणःस्वेषु को न मुच्येत वंघनात् ॥
“जैसे यह पुरुष परदोषों के निरूपण करने में अति कुशल हैं तैसे ही यदि अपने दोषों के निरूपण करने में निपुण हो, तो ऐसा कौन पुरुष है कि जो संसार के कठोर बन्धनों से छूट कर मुक्त न हो जाय ?” दोषों के निरूपण करने का तात्पर्य यही है कि मनुष्य को उसकी नीचता का परिचय भली भाँति हो जाय, उसे “सच्चा पछतावा” उत्पन्न हो और महा पुरुषों की तरह वह सदाचारी एवं श्रेष्ठ बन जाय। परमात्मा की जब बड़ी भारी कृपा होती है तब मनुष्य को अपने दोष दिखाई देते हैं और उसी क्षण उसकी उन्नति का आरम्भ समझना चाहिये। बड़ों के पास अपने दोष कहने से और छोटों के पास ब्रह्मचर्य की महिमा वर्णन करने से भी दोषों की उत्कृष्ट शुद्धि होती है। महापुरुषों के और हमारे वर्ताव में क्या अन्तर है और कौन से दोष त्यागने से हम भी सदाचारी, ब्रह्मचारी और महापुरुष बन सकते हैं यह हमें हमारी “डायरी” बतला सकती है। अतएव आत्मोद्धार के लिए “रोज डायरी का लिखना” अतीव उपकारी है।
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“सततोद्योग”
नियम सत्रहवाँ:—
सम्पूर्ण दुर्गुणों का तथा दुर्भाग्य का मूल कारण एक मात्र आलस्य है, जो कि लोक और परलोक का प्रबल शत्रु है। बेकार स्त्री-पुरुष सदा विकारी व प्रमादी होते हैं और विकारी तथा प्रमादी स्त्री-पुरुषों का ब्रह्मचारी होना सर्वथा असम्भव है। नीचे विचारों को दमन करने के लिये सुविचार एक श्रेष्ठतम उपाय है; सुविचार से भी “सुकर्मरतता” ( न कि कुकर्मरतता ) सर्व-श्रेष्ठ साधन है। “Constant occupation prevents temptation” सुकर्म में फँसे हुए मनुष्य के पास प्रलोभन नहीं आ सकता। आलस्य से मनुष्य के भीतर की संपूर्ण उच्च शक्तियां दब जाती हैं और शुभ कर्मों से—सततोद्योग से संपूर्ण दैवी शक्तियां एक एक करके प्रगट होने लगती हैं और इसी जन्म में मनुष्य के जीवन का प्रचण्ड विकास हो, उसकी कीर्ति-सुगंधि चारों ओर फैल जाती है। निरुद्योगी अर्थात् आलसी पुरुष सप्त जन्म में भी ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। एक मात्र सततोद्योगी ही ब्रह्मचर्य को धारण कर सकता है। आलसी पुरुष जीते जी ही मुर्दा बन जाता है, आलसी पुरुष सदा सर्वदा पापी बना रहता है, संक्षेपतः उद्योग ही जीवन है और आलस्य ही मरण है, उद्योग ही पुण्य है और आलस्य ही पाप है—नरक है अतः जिन्हें पुण्यवान्, भाग्यवान् कीर्तिवान् और वीर्यवान् महापुरुष बनना हो, उन्हें परमावश्यक है कि वे सदा, सर्वदा शुभ कर्मों ही में फँसे रहें। जब कभी कुकर्म की ओर मन जाय तब “तत्काल” कोई अच्छी किताब पढ़ने अथवा इस ग्रंथ
❁ स्वधर्मानुष्ठान ❁
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के इन्हीं नियमों को पढ़ने व कोई अच्छा काम करने वा भगवान् का जोर से नाम स्मरण करने लगेँ अथवा कोई अच्छा भजन गाने लग जायँ। निसर्देह तुम्हारी नीच वासनायें दब जायँगी और पवित्र वासनाओं का उदय होगा। किंवा उस स्थान से हट कर तत्काल सन्निधों में आकर बैठने से और कोई अच्छा विषय छेड़ देने से हमें पूर्ण विश्वास है कि तुम साफ बच जाओगे। अतः वीर्यरक्षा के लिये प्रत्येक व्यक्ति को आलस्य पर लात मार सततोंचोगी अवश्य ही बनना होगा; क्योंकि आलसी पुरुष को कामदेव पटक पटक कर मारता है। यदि हम सतत शुद्ध उचोगी न बनेंगे तो आलस्य ही हमें लात मार कर जमीन में मिला देगा, यह पूर्ण निश्चय जानो। अतः ब्रह्मचारी को सदैव शुभ कर्मों में ही डूबे रहना चाहिए हाथ पर हाथ रख कर निठल्ले बैठने में कुछ विश्रान्ति नहीं है। सच्ची विश्रान्ति काम को बदल बदल कर करने में अर्थात् भिन्न भिन्न कार्य करने ही में है।
“स्वधर्मानुष्ठान”
नियम अठारहवाँ:—
“स्वधर्मै निधनं श्रेयः परधर्मे भयावहः।”
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं “स्वधर्म में मृत्यु श्रेष्ठ परन्तु पर धर्म में जीना भयानक है—निन्दित है।” जो अपने धर्म में प्रीति नहीं कर सकता उसका दूसरे धर्म में प्रीति करना आडम्बर मात्र है, वह उसका व्यभिचार है। धर्म कोई भी हो परन्तु उसमें “हृद
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
विश्वास” की परम आवश्यकता है। श्रद्धा वगैरः सभी धर्म-कर्म वृथा हैं। दृढ़ विश्वास होने पर धर्मान्तर करने की कोई भी आवश्यकता नहीं है और दृढ़ विश्वास धर्म के अज्ञान से नहीं होने पाता। अतः सब से प्रथम अपने ही धर्म का पूरा ज्ञान कर लो। स्वधर्म के अज्ञान से ही मनुष्य पर-धर्म को स्वीकार करता है: जो कि उसकी प्रकृति यानी स्वभाव धर्म के विरुद्ध होने के कारण महान् विनाशक है। यह नितान्त सत्य है कि प्रत्येक धर्म उसी एक परमात्मा के तरफ जाने का रास्ता है; तब फिर स्वधर्म का त्याग कर, पर धर्म के स्वीकार करने की गरज ही क्या है? वैसा करना घोर मूर्खता व अधःपतन है। संपूर्ण धर्मों का सार “चित्त की शुद्धि” है। चित्त की शुद्धि बिना, सभी धर्म-कर्म अधर्म हैं। अद्यायुक्त स्वधर्माचरण से चित्त की शुद्धि अवश्य होती है। श्रीमनु महाराज ने अपने हिन्दू धर्म के लक्षण यों वतलाए हैं:—
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौच इन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥१॥
( १ ) धृति अर्थात् धैर्य, ( २ ) क्षमा अर्थात् दयालुता, ( ३ ) दम यानी मनोनिग्रह, कुविचारों का दमन, ( ४ ) अस्तेय अर्थात् चोरी न करना ( ५ ) शौच का अर्थ कायिक वाचिक मानसिक साँस-गिक आर्थिक वगैरह सब प्रकार की-पवित्रता, ( ६ ) इन्द्रियनिग्रह, ( ७ ) धी अर्थात् सुबुद्धि, ( ८ ) विद्या यानी जिससे मोहान्धकार नष्ट हो, ऐसा ज्ञान ( ९ ) सत्य अर्थात् हँसी-दिल्ली में भी भूँठ न बोलना और ( १० ) अक्रोध यानी क्रोध का न करना अर्थात् शान्ति;—ये धर्म के दश लक्षण हैं।
✽ नियमितता ✽
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यम-नियम अर्थात् मन तथा इन्द्रियनिग्रह करने वाला पुरुष ही केवल धार्मिक अर्थात् सदाचारी तथा ब्रह्मचारी हो सकता है। ब्रह्मचर्य से और धर्म के इन दस लक्षणों से अत्यन्त ही निकट सम्बन्ध है। इन लक्षणों से रहित पुरुष कदापि ब्रह्मचारी हो ही नहीं सकता; धार्मिक पुरुष ही केवल सदाचारी तथा ब्रह्मचारी हो सकता है। सारांश धर्म ही आत्मोन्नति की जड़ है और इसी में ब्रह्मचर्य का सारा रहस्य है। जो धर्म की रक्षा करता है धर्म भी सब प्रकार से उसकी पूर्ण रक्षा करता है। अतः स्वधर्मनिष्ठ बनो।
“नियमितता”
नियम उन्नीसवों :—
प्रकृति स्वयम् नियम-बद्ध है। “कारण बिना कोई भी कार्य नहीं होता” वस इसी एक वाक्य में प्रकृति की प्रचण्ड नियम बद्धता का परिचय मिल रहा है। नियमितता यही प्रकृति का स्वरूप है। और प्रकृति के नियानुसार चलने ही में प्राणिमात्र का कल्याण है। अनियमित पुरुष सदा दुःखी बना रहता है। स्वास्थ्य नाश के जितने कारण हैं उन सब में “अनियमितता” यही प्रमुख कारण है। बहुतेरों के काम बड़े ऊट-पटांग हुआ करते हैं। उनके न सोने का कोई निश्चित समय होता है, न जागने का, न नहाने का, न खाने-पीने तथा पाखाने जाने का। खेल, तमाशे, नाटकों आदि में रात रात जागते रहते हैं और इधर दिन भर सोया करते हैं—इस प्रकार अपने नेत्र, नीति, पैसा और स्वास्थ्य पर अपने हाथ कुल्हाड़ी मार लेते हैं। ऐसी
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❁ ब्रह्मचर्य्य हो जीवन है ❁
वेपरवाही से स्वास्थ्य की तथा ब्रह्मचर्य की आशा करना व्यर्थ है। सोने-जागने, पाखाने जाने, नहाने, ईश्वर-पूजन, भजन करने, खाने-पीने, पढ़ने पढ़ाने-घूमने तथा आराम करने आदि प्रत्येक कार्य का कम अर्थात् नियम बाँध लेने पर तुम्हें बहुत जल्द मालूम होगा कि तुम्हारा शरीर भी घड़ी की सुई की चाल से चल रहा है और प्रत्येक कार्य यंत्र के तुल्य सुखपूर्वक और उन्नतिप्रद हो रहा है। मन भी कर्तव्य-पालन से सुप्रसन्न घ वलिष्ट हो रहा है। नियमितता से मूर्ख भी ज्ञानी, रोगी भी निरोगी, दुर्बल भी प्रबल, अभागा भी भाग्यवान और नीच भी उच्च बन जाता है। नियमितता से मनुष्य में मनुष्यत्व एवं ईश्वरत्व प्रगट होने लगता है। आज तक जितने महापुरुष हुए हैं वे सब नियम के पूरे पावन्द हुए हैं। अनियमित पुरुष को हमने महापुरुष बना हुआ आज तक न देखा है, न सुना ही है। स्वास्थ्य-सुधार के जितने नियम संसार में विद्यमान हैं, उन सब में “नियमित समय पर काम करने का नियम”—सर्व-श्रेष्ठ है। अनियमित पुरुष कदापि निरोगी तथा ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। अतएव आरोग्य तथा ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये नियमितता का पालन करना प्राणिमात्र का प्रथम तथा श्रेष्ठ कर्तव्य है। यह नितान्त सत्य है कि “जिसका कोई नियम नहीं है उसके जीवन का भी कोई नियम नहीं है।”