ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंडायरी
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दोष देखने से वह पवित्र बन जाता है।” दूसरों के दोष देखने के वनिस्वत—जो कि पतन का मूल है—यदि मनुष्य अपने ही दोष देखा करेगा तो उसका उद्धार इसी जन्म में हो सकता है। महा पुरुष कहते हैं:—
यथाहि निपुणः सम्यक् परदोषेक्षणं प्रति । तथाचेन्नपुणःस्वेषु को न मुच्येत वंघनात् ॥
“जैसे यह पुरुष परदोषों के निरूपण करने में अति कुशल हैं तैसे ही यदि अपने दोषों के निरूपण करने में निपुण हो, तो ऐसा कौन पुरुष है कि जो संसार के कठोर बन्धनों से छूट कर मुक्त न हो जाय ?” दोषों के निरूपण करने का तात्पर्य यही है कि मनुष्य को उसकी नीचता का परिचय भली भाँति हो जाय, उसे “सच्चा पछतावा” उत्पन्न हो और महा पुरुषों की तरह वह सदाचारी एवं श्रेष्ठ बन जाय। परमात्मा की जब बड़ी भारी कृपा होती है तब मनुष्य को अपने दोष दिखाई देते हैं और उसी क्षण उसकी उन्नति का आरम्भ समझना चाहिये। बड़ों के पास अपने दोष कहने से और छोटों के पास ब्रह्मचर्य की महिमा वर्णन करने से भी दोषों की उत्कृष्ट शुद्धि होती है। महापुरुषों के और हमारे वर्ताव में क्या अन्तर है और कौन से दोष त्यागने से हम भी सदाचारी, ब्रह्मचारी और महापुरुष बन सकते हैं यह हमें हमारी “डायरी” बतला सकती है। अतएव आत्मोद्धार के लिए “रोज डायरी का लिखना” अतीव उपकारी है।
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