भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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“सततोद्योग”

नियम सत्रहवाँ:—

सम्पूर्ण दुर्गुणों का तथा दुर्भाग्य का मूल कारण एक मात्र आलस्य है, जो कि लोक और परलोक का प्रबल शत्रु है। बेकार स्त्री-पुरुष सदा विकारी व प्रमादी होते हैं और विकारी तथा प्रमादी स्त्री-पुरुषों का ब्रह्मचारी होना सर्वथा असम्भव है। नीचे विचारों को दमन करने के लिये सुविचार एक श्रेष्ठतम उपाय है; सुविचार से भी “सुकर्मरतता” ( न कि कुकर्मरतता ) सर्व-श्रेष्ठ साधन है। “Constant occupation prevents temptation” सुकर्म में फँसे हुए मनुष्य के पास प्रलोभन नहीं आ सकता। आलस्य से मनुष्य के भीतर की संपूर्ण उच्च शक्तियां दब जाती हैं और शुभ कर्मों से—सततोद्योग से संपूर्ण दैवी शक्तियां एक एक करके प्रगट होने लगती हैं और इसी जन्म में मनुष्य के जीवन का प्रचण्ड विकास हो, उसकी कीर्ति-सुगंधि चारों ओर फैल जाती है। निरुद्योगी अर्थात् आलसी पुरुष सप्त जन्म में भी ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। एक मात्र सततोद्योगी ही ब्रह्मचर्य को धारण कर सकता है। आलसी पुरुष जीते जी ही मुर्दा बन जाता है, आलसी पुरुष सदा सर्वदा पापी बना रहता है, संक्षेपतः उद्योग ही जीवन है और आलस्य ही मरण है, उद्योग ही पुण्य है और आलस्य ही पाप है—नरक है अतः जिन्हें पुण्यवान्, भाग्यवान् कीर्तिवान् और वीर्यवान् महापुरुष बनना हो, उन्हें परमावश्यक है कि वे सदा, सर्वदा शुभ कर्मों ही में फँसे रहें। जब कभी कुकर्म की ओर मन जाय तब “तत्काल” कोई अच्छी किताब पढ़ने अथवा इस ग्रंथ