भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 199 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 163

❁ स्वधर्मानुष्ठान ❁

[ १४७ ]

के इन्हीं नियमों को पढ़ने व कोई अच्छा काम करने वा भगवान् का जोर से नाम स्मरण करने लगेँ अथवा कोई अच्छा भजन गाने लग जायँ। निसर्देह तुम्हारी नीच वासनायें दब जायँगी और पवित्र वासनाओं का उदय होगा। किंवा उस स्थान से हट कर तत्काल सन्निधों में आकर बैठने से और कोई अच्छा विषय छेड़ देने से हमें पूर्ण विश्वास है कि तुम साफ बच जाओगे। अतः वीर्यरक्षा के लिये प्रत्येक व्यक्ति को आलस्य पर लात मार सततोंचोगी अवश्य ही बनना होगा; क्योंकि आलसी पुरुष को कामदेव पटक पटक कर मारता है। यदि हम सतत शुद्ध उचोगी न बनेंगे तो आलस्य ही हमें लात मार कर जमीन में मिला देगा, यह पूर्ण निश्चय जानो। अतः ब्रह्मचारी को सदैव शुभ कर्मों में ही डूबे रहना चाहिए हाथ पर हाथ रख कर निठल्ले बैठने में कुछ विश्रान्ति नहीं है। सच्ची विश्रान्ति काम को बदल बदल कर करने में अर्थात् भिन्न भिन्न कार्य करने ही में है।

“स्वधर्मानुष्ठान”

नियम अठारहवाँ:—

“स्वधर्मै निधनं श्रेयः परधर्मे भयावहः।”

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं “स्वधर्म में मृत्यु श्रेष्ठ परन्तु पर धर्म में जीना भयानक है—निन्दित है।” जो अपने धर्म में प्रीति नहीं कर सकता उसका दूसरे धर्म में प्रीति करना आडम्बर मात्र है, वह उसका व्यभिचार है। धर्म कोई भी हो परन्तु उसमें “हृद

ब्रह्मचर्य ही जीवन है · पृष्ठ 163, कुल 199 में से · BharatKosha