भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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विश्वास” की परम आवश्यकता है। श्रद्धा वगैरः सभी धर्म-कर्म वृथा हैं। दृढ़ विश्वास होने पर धर्मान्तर करने की कोई भी आवश्यकता नहीं है और दृढ़ विश्वास धर्म के अज्ञान से नहीं होने पाता। अतः सब से प्रथम अपने ही धर्म का पूरा ज्ञान कर लो। स्वधर्म के अज्ञान से ही मनुष्य पर-धर्म को स्वीकार करता है: जो कि उसकी प्रकृति यानी स्वभाव धर्म के विरुद्ध होने के कारण महान् विनाशक है। यह नितान्त सत्य है कि प्रत्येक धर्म उसी एक परमात्मा के तरफ जाने का रास्ता है; तब फिर स्वधर्म का त्याग कर, पर धर्म के स्वीकार करने की गरज ही क्या है? वैसा करना घोर मूर्खता व अधःपतन है। संपूर्ण धर्मों का सार “चित्त की शुद्धि” है। चित्त की शुद्धि बिना, सभी धर्म-कर्म अधर्म हैं। अद्यायुक्त स्वधर्माचरण से चित्त की शुद्धि अवश्य होती है। श्रीमनु महाराज ने अपने हिन्दू धर्म के लक्षण यों वतलाए हैं:—

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौच इन्द्रियनिग्रहः ।

धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥१॥

( १ ) धृति अर्थात् धैर्य, ( २ ) क्षमा अर्थात् दयालुता, ( ३ ) दम यानी मनोनिग्रह, कुविचारों का दमन, ( ४ ) अस्तेय अर्थात् चोरी न करना ( ५ ) शौच का अर्थ कायिक वाचिक मानसिक साँस-गिक आर्थिक वगैरह सब प्रकार की-पवित्रता, ( ६ ) इन्द्रियनिग्रह, ( ७ ) धी अर्थात् सुबुद्धि, ( ८ ) विद्या यानी जिससे मोहान्धकार नष्ट हो, ऐसा ज्ञान ( ९ ) सत्य अर्थात् हँसी-दिल्ली में भी भूँठ न बोलना और ( १० ) अक्रोध यानी क्रोध का न करना अर्थात् शान्ति;—ये धर्म के दश लक्षण हैं।

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