ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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यम-नियम अर्थात् मन तथा इन्द्रियनिग्रह करने वाला पुरुष ही केवल धार्मिक अर्थात् सदाचारी तथा ब्रह्मचारी हो सकता है। ब्रह्मचर्य से और धर्म के इन दस लक्षणों से अत्यन्त ही निकट सम्बन्ध है। इन लक्षणों से रहित पुरुष कदापि ब्रह्मचारी हो ही नहीं सकता; धार्मिक पुरुष ही केवल सदाचारी तथा ब्रह्मचारी हो सकता है। सारांश धर्म ही आत्मोन्नति की जड़ है और इसी में ब्रह्मचर्य का सारा रहस्य है। जो धर्म की रक्षा करता है धर्म भी सब प्रकार से उसकी पूर्ण रक्षा करता है। अतः स्वधर्मनिष्ठ बनो।
“नियमितता”
नियम उन्नीसवों :—
प्रकृति स्वयम् नियम-बद्ध है। “कारण बिना कोई भी कार्य नहीं होता” वस इसी एक वाक्य में प्रकृति की प्रचण्ड नियम बद्धता का परिचय मिल रहा है। नियमितता यही प्रकृति का स्वरूप है। और प्रकृति के नियानुसार चलने ही में प्राणिमात्र का कल्याण है। अनियमित पुरुष सदा दुःखी बना रहता है। स्वास्थ्य नाश के जितने कारण हैं उन सब में “अनियमितता” यही प्रमुख कारण है। बहुतेरों के काम बड़े ऊट-पटांग हुआ करते हैं। उनके न सोने का कोई निश्चित समय होता है, न जागने का, न नहाने का, न खाने-पीने तथा पाखाने जाने का। खेल, तमाशे, नाटकों आदि में रात रात जागते रहते हैं और इधर दिन भर सोया करते हैं—इस प्रकार अपने नेत्र, नीति, पैसा और स्वास्थ्य पर अपने हाथ कुल्हाड़ी मार लेते हैं। ऐसी