भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

✽ नियमितता ✽

[ १४९ ]

यम-नियम अर्थात् मन तथा इन्द्रियनिग्रह करने वाला पुरुष ही केवल धार्मिक अर्थात् सदाचारी तथा ब्रह्मचारी हो सकता है। ब्रह्मचर्य से और धर्म के इन दस लक्षणों से अत्यन्त ही निकट सम्बन्ध है। इन लक्षणों से रहित पुरुष कदापि ब्रह्मचारी हो ही नहीं सकता; धार्मिक पुरुष ही केवल सदाचारी तथा ब्रह्मचारी हो सकता है। सारांश धर्म ही आत्मोन्नति की जड़ है और इसी में ब्रह्मचर्य का सारा रहस्य है। जो धर्म की रक्षा करता है धर्म भी सब प्रकार से उसकी पूर्ण रक्षा करता है। अतः स्वधर्मनिष्ठ बनो।

“नियमितता”

नियम उन्नीसवों :—

प्रकृति स्वयम् नियम-बद्ध है। “कारण बिना कोई भी कार्य नहीं होता” वस इसी एक वाक्य में प्रकृति की प्रचण्ड नियम बद्धता का परिचय मिल रहा है। नियमितता यही प्रकृति का स्वरूप है। और प्रकृति के नियानुसार चलने ही में प्राणिमात्र का कल्याण है। अनियमित पुरुष सदा दुःखी बना रहता है। स्वास्थ्य नाश के जितने कारण हैं उन सब में “अनियमितता” यही प्रमुख कारण है। बहुतेरों के काम बड़े ऊट-पटांग हुआ करते हैं। उनके न सोने का कोई निश्चित समय होता है, न जागने का, न नहाने का, न खाने-पीने तथा पाखाने जाने का। खेल, तमाशे, नाटकों आदि में रात रात जागते रहते हैं और इधर दिन भर सोया करते हैं—इस प्रकार अपने नेत्र, नीति, पैसा और स्वास्थ्य पर अपने हाथ कुल्हाड़ी मार लेते हैं। ऐसी

१५० ]

❁ ब्रह्मचर्य्य हो जीवन है ❁

वेपरवाही से स्वास्थ्य की तथा ब्रह्मचर्य की आशा करना व्यर्थ है। सोने-जागने, पाखाने जाने, नहाने, ईश्वर-पूजन, भजन करने, खाने-पीने, पढ़ने पढ़ाने-घूमने तथा आराम करने आदि प्रत्येक कार्य का कम अर्थात् नियम बाँध लेने पर तुम्हें बहुत जल्द मालूम होगा कि तुम्हारा शरीर भी घड़ी की सुई की चाल से चल रहा है और प्रत्येक कार्य यंत्र के तुल्य सुखपूर्वक और उन्नतिप्रद हो रहा है। मन भी कर्तव्य-पालन से सुप्रसन्न घ वलिष्ट हो रहा है। नियमितता से मूर्ख भी ज्ञानी, रोगी भी निरोगी, दुर्बल भी प्रबल, अभागा भी भाग्यवान और नीच भी उच्च बन जाता है। नियमितता से मनुष्य में मनुष्यत्व एवं ईश्वरत्व प्रगट होने लगता है। आज तक जितने महापुरुष हुए हैं वे सब नियम के पूरे पावन्द हुए हैं। अनियमित पुरुष को हमने महापुरुष बना हुआ आज तक न देखा है, न सुना ही है। स्वास्थ्य-सुधार के जितने नियम संसार में विद्यमान हैं, उन सब में “नियमित समय पर काम करने का नियम”—सर्व-श्रेष्ठ है। अनियमित पुरुष कदापि निरोगी तथा ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। अतएव आरोग्य तथा ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये नियमितता का पालन करना प्राणिमात्र का प्रथम तथा श्रेष्ठ कर्तव्य है। यह नितान्त सत्य है कि “जिसका कोई नियम नहीं है उसके जीवन का भी कोई नियम नहीं है।”

❁ लंगोट बंद रहना ❁

[ १५१ ]

“लंगोट बंद रहना”

नियम बोसवॉः —

वीर्यरक्षा के लिये सदा सर्वदा लंगोट कसे रहना बहुत ही उपकारी है लंगोट से मन शान्त होता है व अण्डकोप बढ़ने नहीं पाते । लंगोट दोहरा नहीं बल्कि एकहरा ही होना चाहिये जिससे अनावश्यक गर्मी के कारण वीर्यनाश न हो । लंगोट पहनने से पुरुषत्व घटता नहीं, बल्कि अधिक शुद्ध व अत्यन्त नियम-बद्ध होता है—इस बात को लंगोट से डरने वालों को स्मरण रखना चाहिये, क्योंकि यह हमारा क्रीव २० वर्षों का स्वानुभव है ।

“खड़ाऊँ”

नियम इक्कीसवॉः —

पैर के अँगूठे के पास जो बड़ी नस है उसका व जननेन्द्रिय का बड़ा ही भारी लगाव है । वह नस यदि टूट जाय तो मनुष्य एक ही घंटे के भीतर मर जाता है । खड़ाऊँ से जब वह नस दबती है तब उसके साथ साथ काम-वासनायें भी दबने लगती हैं । जूते की गन्दगी से जो जिन्दगी का नाश होता है, सो खड़ाऊँ से नहीं होने पाता । अक्सर सर्दी-गर्मी व रोगादि पैर व शिर इन द्वारों से ही प्रवेश करते हैं । जूते में कितनी बढ़बू भरी रहती है इसका अनुभव जूते के पहनने वालों को भली भाँति होता है । इसी कारण ब्रह्म चारी को जूता पहनना सर्वथा मना है । जूते के टुकड़े टुकड़े उड़

१५२ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

जाते हैं, परन्तु प्रेमी मनुष्य उस वेचारे का पिण्ड नहीं छोड़ते । फिर रोग व कामरिपु भी ऐसे पुरुष का पिण्ड नहीं छोड़ते । यद्यपि बाहर से तेल-पानी और सज-धज के कारण ऐसा पुरुष वेश्या की तरह सुन्दर दिखाई देता हो, परन्तु उसका वह सौंदर्य गुप्त-रोग व पाप से भरा रहता है और इस बात की सत्यता थोड़ा सा निष्पक्ष आत्म-संशोधन करने से तत्काल मालूम होती है । अस्तु ।

सभी जगह पवित्रता आवश्यक है, इसमें कोई संदेह नहीं । खड़ाऊँ से मनोविकार शान्त होते हैं, वह हमारा अनुभव है; तथा दृष्टि भी सतेज होती है । पर हाँ, ऐसा रही खड़ाऊँ न पहिनना चाहिये। जिससे कष्ट हो, खड़ाऊँ हल्का व सुखप्रद होना चाहिये । खड़ाऊँ का अच्छापन अथवा बुरापन उसकी खूँटी पर सर्वथा निर्भर है । अतः खूँटियों की गुण्डियाँ चौड़ी तथा सुखावह हों ।

“पैदल चलना”

नियम बाईसवाँ :—

ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये पैदल चलना आवश्यक बात है । व्यर्थ थोड़ी थोड़ी बात के लिये व थोड़ी दूर के लिये विना आवश्यकता के गाड़ी घोड़े, एक्का, टॉगा, साइकिल इत्यादि पर चढ़ना निःसन्देह ब्रह्मचर्य से नीचे गिरना है । साइकिल पर बैठने से तो ब्रह्मचर्य तथा स्वास्थ्य को बहुत हानि होती । कैसी ही दिशा मालूम होती हो परन्तु एक मील तक साइकिल पर बैठ के जाने से ही

❁ लोक-निन्दा का भय ❁

[ १५३ ]

वह दव जाती है, अंब कहो ! फिर स्कास्थ्य की आशा कहाँ ? साइकिल पर बैठने से जननेन्द्रिय की निचली नसों पर बड़ा कठोर दबाव पड़ता है, जिससे मनुष्य का पुरुष-बल घटने लगता है । साइकिल पर विशेष बैठने वाले विशेष नामर्द एवं नपुंसक होते हैं ।

आराम-तलब पुरुष सात जन्म में भी ब्रह्मचारी नहीं हो सकता । और इस बात को पता धनी लोगों पर दृष्टि डालने से तत्काल लगता है । धनी पुरुष हमेशा बहुत दुःखी, बड़े लंगड़े और बहुत काम के कारण बेकाम बने हुए होते हैं । वे सदा सर्वदा रोगी ही बने रहते हैं । हे भगवन ! पैदल टहलने का महत्व इन लोगों के ध्यान में कब आवेगा और उनका तथा देश का उद्धार कब होगा ? हमें अब शीघ्र जागृत कीजिए, यही आप से हमारी नम्र प्रार्थना है !

“लोक-निन्दा का भय”

नियम तेईसवाँ :—

इस ग्रन्थ में वर्णन किए हुए “वीर्य-नाश के कुछ मुख्य लक्षण” बार बार पढ़ो और शीशे में अपना मुंह ज़रा देखो । घमण्डी बनने के भाव से नहीं, किन्तु घमण्ड को दूर करने के भाव से देखो । यदि तुम्हारे नेत्र, नाक के कोने के पास काले होने लगे हों तो उन्हें वीर्य के नाश से और भी काले मत बनाओ और फिर अपना काला मुँह लेकर अकड़ कर समाज में न घूमो; बुद्धिमान पुरुष तुम्हें देखते ही पहचान लेंगे कि तुम कितने बरबाद हुए हो; भला अब इस ग्रथ को पढ़ने वाले पुरुष से तम छिप सकोगे ? क्या

१५४ ]

❁ ब्रह्मचर्य्ये ही जीवन है ❁

साधुन से वह नेत्र के काले धव्वे निकल सकेंगे ? कदापि नहीं ! सभ्य स्त्री-पुरुष या बालक को अपनी ऐसी पतित दशा देखकर— अपना काला मुँह देखकर 'निःसंदेह वड़ा ही दुख होगा—उन्हें कृत कर्मों' का पछतावा होगा । प्रिय मित्रो ! तुम्हें यदि सच्चा पछतावा होता हो तो हम आप को इसकी अत्यन्त सुलभ आप्धि बतलाते हैं कि "वीर्य-रक्षा करो" वस, यही इसकी सुलभ व अनुभव-सिद्ध आप्धि है । जितना अधिक तुम वीर्य धारण करोगे उतना ही अधिक तुम्हारा मुँह उज्ज्वल बनता जायगा । आँखों की वह कालिमा नष्ट होती जायगी और जितना अधिक तुम वीर्य-नाश करोगे उतना ही अधिक तुम्हारा मुँह काला बनता जायगा । यदि तुम छः ही मास वीर्य-संग्रह करोगे तो तुम्हारे तन, मन दोनों पवित्र बन जायेंगे और चेहरा स्वच्छ बन जायगा, पूर्ण विश्वास रखो । जब से तुम वीर्य धारण करने लगे तब से ऐसी 'हृद भावना' रखो किः— "हमारे नेत्र स्वच्छ हो रहे हैं ।" ( नेत्र पर से हाथ घुमाकर कहो कि—) अब कालिमा नष्ट हो रही है । सूर्य के माफिक मेरे नेत्र तेज संपन्न हो रहे हैं । मेरी दृष्टि पवित्र हो रही है—पाप दृष्टि नष्ट हो रही है । मैं निष्पाप हूँ ! पवित्र हूँ !! तेजस्वी हूँ !!!" इत्यादि । तुम इस ग्रन्थ में के दिव्य नियमानुसार चलने से वीर्य-रक्षा प्रतिज्ञापूर्वक कर सकते हो, ऐसा हमारा अत्यन्त हृद अनुभव है । प्राणायाम से दृष्टि अत्यंत तीव्र होती है । हाँ, कीर्ति की तथा आत्मोद्धार की सच्ची इच्छा जरूर होनी चाहिये । 'लोक निन्दा का भय वीर्यनाशकारिणी कुवृत्तियों को रोकने के लिये अति उत्तम उपाय है'—ऐसा सज्जनों का अनुभव है ।

❁ ईश्वर भक्ति ❁

[ १५५ ]

“ईश्वर भक्ति”

नियम चौबीसवाँ :—

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।

साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्ब्यवसितोहि सः ॥१॥

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्चञ्चान्तिं निगच्छति ।

कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ २ ॥

—गीता अ० ६ श्लो० ३०—३१ ।

अर्थः—“कितने ही दुराचारी क्यों न हों; परन्तु यदि वह मुझे ‘एक निष्ठ भाव से’ भजता है तो उसे साधू ही समझना चाहिये; क्योंकि उसकी बुद्धि का निश्चय अच्छा हुआ है। वह बहुत शीघ्र धर्मात्मा होता है व चिर-शान्ति को प्राप्त होता है। हे कौन्तेय ! तू पूर्ण ध्यान में रख कि ‘मेरे भक्त को कभी अधोगति हो ही नहीं सकती।’”

संतप्त मन को शान्त करने के लिए और अपवित्र मन को पवित्र व सर्व श्रेष्ठ बनाने के लिए “भगवद्भक्ति” एक मात्र सब से श्रेष्ठ, सुलभ व सच्चा उपाय है। अन्य उपाय कष्टप्रद हैं। अतएव आत्म-शुद्ध्यर्थ भगवान का स्मरण, ध्यान, गान, आदि आप को रोज अवश्य ही करना होगा। जैसी हमारी भक्ति होगी वैसी ही हम में विरक्ति भी प्रकट होगी। “हरि व्यापक सर्वत्र समाना, प्रेम ते प्रकट होहि मैं जाना।” श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छुद्धः स एव सः।” यानी “मनुष्य श्रद्धामय है; जैसी उसकी श्रद्धा होती है

  • भक्तियोगेनमक्षिष्टोमद्भावायोपपद्यते ॥—भगवान् श्रीकृष्ण ॥

१५६ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

ठीक वैसा ही बन जाता है” ऐसा भगवान का भी वचन है। क्रोधी भाव से क्रोधी, कामी भाव से कामी, अभिमानी भाव से अभिमानी, व्यभिचारी भाव से व्यभिचारी, प्रेमी भाव से प्रेमी; ब्रह्मचारी भाव से ब्रह्मचारी व ईश्वरीय भाव से मनुष्य भी निसन्देह ईश्वररूप बन जाता है। वास्तव में मन जिसका ध्यान करता है, वह तद्रूप ही बन जाता है। दोषवर्णन से मनुष्य जैसा दोषी बन जाता है, वैसे ही सदगुण वर्णन से मनुष्य भी निसन्देह सदगुणी बन जाता है। तब फिर भगवान् के गुण वर्णन करने से और उसी का नियम पूर्वक ध्यान करने से हम प्रत्यक्ष भगवद्रूप ही क्यों बन जायेंगे ? अवश्य बन जायेंगे। यदि हम हनुमान जी का ध्यान और गुणगान करेंगे तो हम भी उन्हीं के समान भक्त व ब्रह्मचारी अवश्य बन जायेंगे। अतएव ब्रह्मचारी को चित्त-शुद्धि के लिये रोज “नियम-पूर्वक सुबह शाम दोनों वक्त भगवद्भजन, पूजन, स्मरण ध्यान आदि अवश्यावश्य करना ही चाहिये; क्योंकि भगवान कहते हैं “मेरी भक्ति करने वाले मेरे ही स्वरूप में आकर मिलते हैं और स्त्री की भक्ति करने वाले स्त्री-रूप में वा शूकर कूकर के रूप में जा मिलते हैं। “विषय विरक्त” वस, इसी एक शब्द में संपूर्ण ब्रह्मचर्य का सार भरा हुआ है जो कि “भगवद्भक्ति” से हर किसी को सहज ही में “निसन्देह” प्राप्त होती है। आत्मोद्धार चाहने वालों को अवश्य अनुभव करना चाहिये।

भोजन के प्रत्येक कौर से जैसे भूख की शान्ति व शरीर की पुष्टि तथा कान्ति बढ़ती जाती है, वैसे ही ज्यों ज्यों भक्ति का सेवन किया जाता है, त्यों त्यों विरक्ति व मुक्ति भी मनुष्य को निसन्देह प्राप्त होती रहती है।

❁ ईश्वर भक्ति ❁

[ १५७ ]

संक्षेप में कहा जाय तो, विषय-वैराग्य ही भाग्य है और वही शान्ति का मूल है। आचार्य कहते हैं:—“दुखी सदा कः ?” सदा दुखी व अभागा कौन है ? “विषयानुरागी,” जो विषयासक्त है सो ! “शान्ति शान्तिमान्नोति नकाम कामी” भगवान कहते हैं:—“कामी पुरुष कदापि शान्त नहीं हो सकता,” विषयवासना ही संपूर्ण दुःखों को जड़ है और विषय-वैराग्य ही संपूर्ण सुखों की एक मात्र कुञ्जी है। और यह विषय-वैराग्य किंवा विषय विरक्ति भगवान की भक्ति से हमें निस्सन्देह प्राप्त होती है, ऐसा असंख्य महापुरुषों का तथा श्रीतुलसीदास जी जैसे कट्टर महाभक्त का स्वानुभाविक सिद्धान्त है—“प्रेम भक्ति जल-विद्युत् खग राई, अभ्यन्तर मल कवहु न जाई ।” अहह ! बहुत ही सत्य है

सत्य वचन अरु नम्रता परतिय मात समान' ।

इतने पर हरि ना मिलै तुलसीदास जमान ॥ १ ॥

अतः यदि हमें अपना उद्धार करना हो, अपने मन को दुरुस्त करना हो, परम शुद्ध व परम श्रेष्ठ बनाना हो, तो “रोज्ञ नित्य नियम पूर्वक” परम कृपालु परमात्मा का भजन, पूजन हमें अवश्य ही करना चाहिये। भगवद्भक्ति ही सब दुःखों से मुक्ति पाने का तथा चित्त शुद्धि का सर्वश्रेष्ठ उपाय है; और चित्त शुद्धि ही ब्रह्मचर्य का सच्चा रहस्य है।

१५८ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

“नियम नियमावली का पाठ”

नियम पचीसवाँ :—

रोज़ प्रातः इस ब्रह्मचर्य की नियमावली का अवलोकन व पठन करना कभी न भूलना चाहिये; क्योंकि इसी में ब्रह्मचर्य रक्षा का सार है—इसीमें चैतावनी है इसीमें ब्रह्मचर्य के संस्कार हैं। नियमावली को एक बार ‘प्रातःकाल में रोज़ देखो ? बहुत उपकार होगा। हम विश्वास दिलाते हैं कि यह आपका “नियम दर्शन वा पठन कभी निष्फल नहीं होगा,” तुम्हें वह अवश्य वलपूर्वक सन्मार्गपथ पर घसीट कर ले आवेगा। इतना ही नहीं बल्कि यदि कोई इस नियमावली का सतत एक वर्ष तक पाठ शुरू रखेगा तो उसमें क्या ही ऊँचे भाव पैदा होंगे इसका खुद उसी को अनुभव हो जावेगा, हाथ कंगन को आरसी क्या ? हम प्रतिज्ञापूर्वक कह सकते हैं कि यह पचीस नियम वा ‘ब्रह्मचर्य-नियम पचीसा’ मुद्दे को भी चैतन्यमयी बना सकता है ! वस ! इससे अधिक क्या कहें ! स्वयं अनुभव कीजिये ! ॐ ! इति !

१६—सम्पूर्ण सुधारों का दादा ब्रह्मचर्य

आजकल देश भर में शूरों की सेना बढ़ रही है। जिसे देखो वही व्याख्यानदाता और देशसुधारक बनता फिरता है। इधर-उधर मण्डूकमंडली का टर्न टर्न कोलाहल सुनाई दे रहा है। कागजी घोड़ों के खुरों की खनखनाहट जोर शोर से कानों में घुस रही है।

❁ सम्पूर्ण सुधारों का दादा ब्रह्मचर्य ❁

[ १५९ ]

ऐसा मालूम होता है मानों अब कोई बड़ा भारी कर्मवीर हमारी सहायता करने के लिये आ ही रहा है ! परन्तु देखते हैं क्या : “कुछ नहीं !” कोई देशभक्ति के बहाने, कोई देशकार्य के बहाने, कोई समाजस्थापन के बहाने, अपना अपना स्वार्थसाधन कर रहे हैं । कोई ऐसे उदार पुरुष हैं, कि विना पैसे लिये व्याख्यान ही नहीं देते ? भला ऐसे देशभक्तिशून्य वाक्य पंडितों से देश का क्या सुधार हो सकता है ? केवल बातों के लड्डुओं से कौन घृत हो सकता है ? हमें ऐसे/प्रत्यक्ष निःस्वार्थी कर्मवीरों की बड़ी भारी आवश्यकता है, जिनके केवल मुख ही नहीं, बल्कि संपूर्ण शरीर ही हमारे सच्चे कर्तव्य की हमें सच्ची शिक्षा दे सकते हैं । एक आदर्श पुरुष देश का जितना सुधार कर सकता है, उस सुधार का एक सहस्रांश भी सुधार हजारों निर्वीर्य वाक्यपंडित अपने आयु भर के कोरे व्याख्यानों से नहीं कर सकते ! व्याख्यानवाजी से कोई कदाचित् समझता हो कि भारत अब जाग उठा है, तो यह उसकी गलती है । भारत जैसा पहले था वैसा ही आज भी है; हिन्दुस्तान पहले की तरह आज भी ठण्डा ही है । विशेष फ़रक हुआ है सो यही कि वह पहले से आज अधिक बढ़बढ़ करने लगा है । भारत में प्रत्यक्ष निःस्वार्थी कर्मवीर बहुत ही कम दिखाई देते हैं; स्वयं दुराचारी, अत्याचारी व दम्भी होने पर भी अपने को सदाचारी और ब्रह्मचारी समझना तथा लोगों के नेता होने का दम भरना, इससे सुधार तो नहीं बल्कि भारत का विगाड़ ही अधिक हुआ है और होता है । वगैर नीतिवल के—चारित्र्यवल के—कोई पुरुष कदापि श्रेष्ठ व यशस्वी हो ही नहीं सकता, यह अटल सिद्धान्त है । और नीतिवल, चारित्र्यवल किंवा आत्मवल, विना ब्रह्मचर्य के धारण

१६० ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवत है ❁

किये समजम्म में भी प्राप्त नहीं हो सकता, यह भी उतना ही सत्य सिद्धान्त है। अपने को नेता समझने वाले बड़े बड़े लोग आज दो चार ही नहीं बल्कि सैकड़ों सुधारों के पीछे पड़े हैं। क्या सामाजिक, क्या धार्मिक, क्या व्यवहारिक, कोई भी सुधार क्यों न हो, परन्तु बिना इस एक विषय में अर्थात् ब्रह्मचर्य में सुधार किये, कोई भी सुधार कदापि चिरस्थायी व यशस्वी हो नहीं सकता यह सिद्धान्त वाक्य हमें हृदय पट में अंकित कर वा अपनी दृष्टि के समाने बड़े बड़े अक्षरों में टैंगवा कर रखना चाहिये और रोज उसका दर्शन करना चाहिये। चणिक सुधार किस काम का? पानी पर लकीरें खींचने से क्या मतलब व जड़ को छोड़ कर डाल और पत्तियों पर पानी छिड़कने से क्या लाभ? यह नितान्त सत्य है कि, सम्पूर्ण सुधारों की और यश की कुंजी एक मात्र ब्रह्मचर्य ही है। बिना वीर्यधारण किये कोई भी जाति कदापि उन्नत नहीं हो सकती। निवीर्य जाति दूसरों की सदा गुलाम ही बनी रहती है। यदि हमें गुलामी को जड़ मूल से हटाना हो, हमें स्वतंत्र, सुखी, सत्ताशाली और वैभवसम्पन्न बनना हो, और पहले की तरह पुनः श्रेष्ठ बनना हो तो हमें पहले के समान पुनः वीर्यसम्पन्न अवश्य ही बनना होगा ! बिना ब्रह्मचर्य धारण किये हम कदापि पूर्व वैभव प्राप्त नहीं कर सकते। ब्रह्मचर्य ही सम्पूर्ण उन्नति का वीज मंत्र है ! ब्रह्मचर्य ही सम्पूर्ण सुखों का निधान है !! ब्रह्मचर्य ही एक मात्र सम्पूर्ण सुधारों का दादा है !!!

❁ हमारी भारत माता ❁

[ १६१ ]

२०—हमारी भारत माता

अब स्पष्ट मालूम हो गया है कि केवल ब्रह्मचर्य धारण ही में हमारा तथा देश का सच्चा कल्याण है, पुनरुद्धार है। ब्रह्मचर्य ही से हम पुनः सिंह बन सकते हैं ब्रह्मचर्य ही से हम सभी को भयभीत कर सकते हैं, ब्रह्मचर्य ही से हम सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त कर सकते हैं ब्रह्मचर्य ही से हम स्वतंत्र तथा सम्पूर्ण जगत् के स्वामी बन सकते हैं, यही नहीं बल्कि ब्रह्मचर्य ही से हम परब्रह्म को भी वशीभूत कर सकते हैं फिर सामान्य लोगों की कथा ही क्या है।

जो भारत एक समय सिंह-तुल्य निर्भय, स्वतंत्र व बलिष्ठ था; जिसके गर्जन तर्जन से सम्पूर्ण दिग् मण्डल कांप उठता था, जिसके तरफ कोई भी राष्ट्र आँख उठा के नहीं देख सकता था, जिस भारत में मणि मौक्तिक के खिलौने हमारे हाथ में रहते थे, उसी भारत में आज हमारे हाथ में की रोटी का टुकड़ा भी छीन लूट कर और मार पीट कर दूसरे लोग ले जा रहे हैं और हमें भूखों मार रहे हैं ! हांय ! इससे बढ़कर और दुःखमय स्थिति कौन सी हो सकती है ? आज हम वकरी के माफिक बन गये हैं; जो आता है सोई हमें हलाल करता है। हम अपना सच्चा सिंह स्वरूप भूल गये हैं। हमारे में पूर्वजों का वीर्य नहीं दिखाई देता; हम आज निर्वीर्य से हो गये हैं।

ऐ मेरे परम प्रिय भाइयो और बहिनों ! अब आँखें खोलो ! जागो ! विषय की मोहनिद्रासे अति शीघ्र जागो। और अपनी तथा देश की स्थिति पर कृपादृष्टि डालो ! हमारी असहाय भारत माता आँसू-भरे नयनों से आशायुक्त अन्तःकरण से हमारी तरफ देख

११

१६२ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

रही है। भाइयों ! अपनी इस परमप्यारी भारत माता को अब दास्य से मुक्त कीजिये, उसका वैभव उसे पुनः प्राप्त कर दीजिये ! भारत की स्वतंत्रता एक मात्र हमारी स्वतंत्रता के ऊपर सर्वथा निर्भर है और हमारी स्वतंत्रता एक मात्र विपय की गुलामी छोड़ने में अर्थात् पूर्वजों की तरह वीर्य धारण करने ही में है।

जैसे कोई गत-वैभव असहाय विधवा अपने एकलौते पुत्र पर सुख की आशा रखकर दुःख में दिन बिताती है, उसी प्रकार यह परम दुखी भारत-माता भी तुम जैसे बालकों पर सुख की आशा रखकर जीवन धारण किये हुये है और बड़े कष्ट व आपदा को सह रही है। वह अब कहां तक धीरे पंकड़ेगी मालूम नहीं।

चेतावनी

“तू सिंहशावक हिन्दवालक ! छोड़ अपनी भीरुता । पूर्वजों के तुल्य जग में अब दिखा दे वीरता ॥ १ ॥

“वीर्य ही में वीरता है वीर्य धारण अब करो । आर्यमाता दास्य में है दुःख उसका तुम हरो ॥ २ ॥

“प्राणधारण कर रही है बाट अपनी हूँठ रही । हाय ! तौ भी हिन्दजनता विपयसुखमें सो रही ॥ ३ ॥

“घोर निद्रा छोड़ करके जग उठो अब एक दम । आर्यपुत्रो ! शीघ्रता से अब बंदाओ निज कदम ॥

“दासता से मृत्यु अच्छी दीनता को फेंक दो । राज्य अपना आत्म-बल से प्राप्त कर दिखलाय दो ॥

❁ हमारी भारत माता ❁

[ १६३ ]

“वीर्यही में वीरता है ! बाहुबल है !! राज्य है !!!

आत्मबल❁ में मुक्तता है ! और मारगत्याज्य है ॥ ६ ॥

अतएव ऐ वीर-पुत्रो ! अब ऐसा सुदीपन छोड़ दो ! स्वयं अपने पूर्वजों की तरह ब्रह्मचर्य धारण कर, वीर्यवान् और नरसिंह बन कर अपनी दुःखी माता को अब तत्काल मुक्त करो व मुक्त करके उसे उसके पूर्व वैभवयुक्त स्वातंत्र्य-सिंहासन पर आदरपूर्वक विठला दो । अहह ! क्या ही वह आनन्द का दिन होगा ! प्रभो ! अब कृपा करो और “वह शुभ दिन” अति शीघ्र दिखलाओ !

परमात्मा तुम्हें सुबुद्धि तथा बल प्रदान करे ऐसा हमारा आप को पूर्ण प्रेमाशीर्वाद है ।

“पद्य”

“वताओ मुझे देश कोई कहीं, इसी हिन्द का हो ऋणी जो नहीं ॥ १ ॥

“जहाँ ये भीष्म भीम जैसे बली । सुखी, दीर्घजीवी, शुची, निच्छृंखली ॥ २ ॥

“रहा विश्व में जो बड़े से बड़ा । वही देश ! हा ! आज नीचे पड़ा ॥ ३ ॥

*आत्मबल यानी अपना बल, सच्ची स्वतन्त्रता अपने ही बाहुबल से मेल सकती है और चिरकाल तक उपभोगी जा सकती है ! दूसरों के बल : मिली हुई स्वतन्त्रता परतन्त्रता के तुल्य ही होती है; क्योंकि वह विना आत्मबल के— अपने बल के— बहुत काल तक अपने पास रह ही नहीं कती ! सारांश “बल में बल अपना ही बल !”

१६४ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

“वचाओ उसे जोश जी मैं भरो, उठो भाइयो ! वीयंरत्ना करो ॥४॥

वीयंरत्ना ही आत्मोद्धार है । वीयंरत्ना ही देशोद्धार है !! वीयंरत्ना ही स्वर्गोद्धार है !!! संपूर्ण गुलामियों से मुक्ति पाने का एक मात्र दिव्य साधन है ।

“किस काम की नदी वह जिसमें नहीं खानी । जो जोश हो न हो तो किस काम की खानी ॥१॥

वस प्यारे ! सब की जड़ एक मात्र ब्रह्मचर्य ही है । ब्रह्मचर्य ही से ब्रह्म की प्राप्ति होती है और ब्रह्मचर्य ही से मनुष्य काल को जीत लेता है । इसके लिये वेद का प्रमाण—

“ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाव्रत । इन्द्रोह ब्रह्मचर्येण देवेश्यः स्वराभरत ॥ १ ॥ अथर्ववेद १-५-१९

“ऋषियों ने ब्रह्मचर्य के तप ही से मृत्यु को जीत लिया और ब्रह्मचर्य ही से उन्हें आत्मप्रकाश भी हुआ है अर्थात् वे ईश्वरत्व को प्राप्त हुये हैं ।”

“उत्तिष्ठत ! जाग्रत !!-प्राप्यंवराभिबोधत !!! “उठो ! जागो !! और सद्बोध रूपी, इस महाप्रसाद का यथेष्ठ सेवन करो !!! ॐ शान्तिः पुष्टिस्तुष्टिश्चास्तु । ब्रह्मार्पणमस्तु !

ॐ ।

❁ परिशिष्ट ❁

[१६९]

परिशिष्ट

योग-चिकित्सा

ब्रह्मचर्य्य ब्रत पालन के विषय में पिछले परिच्छेदों में सब कुछ लिखा जा चुका है। परन्तु हमारे कुछ कुपालु पाठकों तथा मित्रों ने हमें सम्मति दी है कि इसमें योग-चिकित्सा विषय पर भी एक अध्याय होना चाहिये। विचार करने पर हमें भी उनकी सम्मति उचित प्रतीत हुई। इसलिए हम यहाँ पर ब्रह्मचर्य्य ब्रतपालन के लिए, योग-चिकित्सा के विषय में भी कुछ वता देना आवश्यक समझते हैं।

हमारे प्राचीन सद्गुरुओं में योगाभ्यास की बड़ी महिमा वर्णित है। योगाभ्यास से शरीर के समस्त दोष दूर हो जाते हैं। यही नहीं, हमारे प्राचीन साहित्य में तो इस बात तक के प्रमाण मिलते हैं कि हमारे पूर्वज ऋषियों ने मृत्यु तक को, इसी योगाभ्यास द्वारा जीत लिया था। हमारा अतीत इतिहास यह प्रमाणित करता है कि हमारे पूर्वज इच्छानुसार दीर्घायु लाभ करते रहे हैं। आज कल जब कभी हम सुनते हैं कि अमुक पुरुष की आयु सौ वर्ष से अधिक की है तो हमको आश्चर्य सा होता है। पर हम इस बात का विचार नहीं करते कि हमारे पूर्वजों की आयु तो प्रायः सौ वर्ष से ऊपर हुआ करती थी। बात यह है कि हमारे पूर्वज योगाभ्यास करते हुए इच्छानुसार स्वास्थ्य लाभ करते थे। ऐसी दशा में दीर्घायु प्राप्त होना क्या कठिन था ?

१६६]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

पातञ्जल योग-सूत्र में योग के आठ अङ्ग बतलाये हैं। यथा— “यमनियमासनं प्राणायाम, प्रत्याहार धारणाध्यान । समाधियोऽष्टावङ्गानि” ॥

अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारण, ध्यान और समाधि। इनमें भी आसन, प्राणायाम, धारण, ध्यान और समाधि ये पांच अंग ही मुख्य माने गये हैं। प्राचीन काल में हमारे देश में थोड़ा बहुत योग का अभ्यास रखने का प्रचलन था। इसी कारण उस काल में हमारे पूर्वज मानसिक और शारीरिक बल प्राप्त करके पूर्ण स्वस्थ रहते और पूर्णायु को प्राप्त होते थे। जिन रोगों पर औषधियाँ काम न देती थीं, योग-साधन से वे उन रोगों से भी मुक्त हो जाते थे। अविद्या से ज्यों ज्यों शनैः शनैः योग-विद्या का लोप होता गया, देशवासियों ने स्वास्थ्य और फलतः दीर्घायु का दिवाला निकाल दिया। आसन और प्राणायाम योग के सब से मुख्य अङ्ग माने गये हैं। कितने खेद की बात है कि इन दोनों के दोनों योग-साधनों का लोप सा हो गया है। अनेक धार्मिक सज्जन महानुभाव प्राणायाम तो येन केन प्रकारेण कर भी लेते हैं, पर योगासनों का तो सर्वथा लोप हो गया है। पर प्राणायाम आत्म-शुद्धि के लिए जितना आवश्यक है, योगासन शारीरिक विकास के लिए उससे भी अधिक उपयोगी है। कहा भी है—

“आसनानि समस्तान, सावन्तो जीव जन्तवः चतुरशीति लक्षाणि, शिवेनकथितंपुरा ॥

योगासनों का अभ्यास शौच, स्नान, व्यायाम आदि से निपट कर बिना कुछ खाये-पिये, प्रातःसायं ऐसे स्थान पर करना चाहिये,

❁ सिद्धासन ❁

[ १६७ ]

जहाँ शुद्ध वायु विपुलता से आती हो और प्रकाश भी पर्याप्त हो। यों तो योगासन अगणित हैं। योनियों की संख्या चौरासी लाख है। योनियों की संख्या के अनुसार ही चौरासी लाख योगासन योगिराज भगवान् शङ्कर ने बतलाये हैं; पर उनमें चौरासी मुख्य हैं। योगी और महात्मा लोग इन चौरासी आसनों का अभ्यास करते हैं। पर साधारण जीवन में ब्रह्मचर्य्य ब्रत पालन के लिए इन सभी आसनों का प्रयोग आवश्यक नहीं है। इस लिए हम यहाँ पर उन्हीं मुख्य आसनों का वर्णन करेंगे, जिनसे ब्रह्मचर्य्य-रक्षा में अपेक्षित सहायता मिल जाती है।

(१) सिद्धासन

पहले पलथी मारकर बैठ जाइये। फिर बाँये पैर की एड़ी को गुदा और अण्डकोपों के मध्य में, मज्जवृत्ती के साथ जमा दीजिये इसके बाद दाहिने पैर की एड़ी को लिंग के ऊपर, मूल में, जमा दीजिये। ठोड़ी को हृदय में, अर्थात् कंठमूल से थोड़ी दूर लगाइये और स्थिर होकर शरीर को सीधा कीजिये, फिर भौहों के मध्य में दृष्टि को ऐसा स्थिर कीजिये कि पलक और नेत्र विलकुल हिल-डुल न सकें। हाथों को घुटनी पर रख लीजिये। दोनों पैर एक दूसरे पर इस तरह आ जाने चाहिये कि दोनों की संधि-स्थान की हड्डियाँ ठीक एक दूसरे पर आ जायँ। इस समय श्वास-प्रहरण और श्वास-त्याग की क्रियायें बहुत धीरे-धीरे शान्ति के साथ होनी चाहिये। इस आसन का अभ्यास करते समय इस बात का ध्यान

१६८]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

रखना आवश्यक है कि पीठ की रीढ़ सीधी रहे। पीठ की रीढ़ में शरीर की सारी नसें फैली हुई हैं। इसी को मेरुदंड कहते हैं। शरीर का यही मूलाधार है। साधारण रूप से चलते फिरते समय भी इसको सीधा रखना चाहिये।

यह आसन एक मास के निरन्तर अभ्यास से लाभप्रद सिद्ध होता है। पर इस आसन का अतिशय अभ्यास हानिकारक भी होता है क्योंकि यह आसन कामोत्तन का नाशक है। अतिशय अभ्यास से इसका प्रभाव सन्तानोत्पादन शक्ति को इतना क्षीण बना देता है कि काम बिल्कुल शान्त पड़ जाता है। और पुरुष स्त्री के काम का नहीं रह जाता। पर इस भय से इस आसन का करना ही स्थगित कर देना ठीक नहीं है। ब्रह्मचर्य के लिए यह आसन अतीव लाभकर है। अंति तो सर्वत्र और सर्वदा वर्जित है। इसलिए इसका थोड़ा अभ्यास अवश्य रखना चाहिये।

(२) पद्मासन

इस आसन में भी पहले पलथी मारकर बैठ जाइये, फिर दाहिने पैर को बाईं जाँघ पर और बायें पैर को दाहिनी जाँघ पर जमा दीजिये। फिर बायां हाथ बायें घुटने पर और दाहिना हाथ दायें घुटने पर रखिये। इस आसन में पीठ, गला, स्तर, रीढ़ बिल्कुल सीध में होनी चाहिये। अपनी दृष्टि को भौहों के बीच या नासिका पर लगा देना चाहिये।