भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

रखना आवश्यक है कि पीठ की रीढ़ सीधी रहे। पीठ की रीढ़ में शरीर की सारी नसें फैली हुई हैं। इसी को मेरुदंड कहते हैं। शरीर का यही मूलाधार है। साधारण रूप से चलते फिरते समय भी इसको सीधा रखना चाहिये।

यह आसन एक मास के निरन्तर अभ्यास से लाभप्रद सिद्ध होता है। पर इस आसन का अतिशय अभ्यास हानिकारक भी होता है क्योंकि यह आसन कामोत्तन का नाशक है। अतिशय अभ्यास से इसका प्रभाव सन्तानोत्पादन शक्ति को इतना क्षीण बना देता है कि काम बिल्कुल शान्त पड़ जाता है। और पुरुष स्त्री के काम का नहीं रह जाता। पर इस भय से इस आसन का करना ही स्थगित कर देना ठीक नहीं है। ब्रह्मचर्य के लिए यह आसन अतीव लाभकर है। अंति तो सर्वत्र और सर्वदा वर्जित है। इसलिए इसका थोड़ा अभ्यास अवश्य रखना चाहिये।

(२) पद्मासन

इस आसन में भी पहले पलथी मारकर बैठ जाइये, फिर दाहिने पैर को बाईं जाँघ पर और बायें पैर को दाहिनी जाँघ पर जमा दीजिये। फिर बायां हाथ बायें घुटने पर और दाहिना हाथ दायें घुटने पर रखिये। इस आसन में पीठ, गला, स्तर, रीढ़ बिल्कुल सीध में होनी चाहिये। अपनी दृष्टि को भौहों के बीच या नासिका पर लगा देना चाहिये।