भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ सिद्धासन ❁

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जहाँ शुद्ध वायु विपुलता से आती हो और प्रकाश भी पर्याप्त हो। यों तो योगासन अगणित हैं। योनियों की संख्या चौरासी लाख है। योनियों की संख्या के अनुसार ही चौरासी लाख योगासन योगिराज भगवान् शङ्कर ने बतलाये हैं; पर उनमें चौरासी मुख्य हैं। योगी और महात्मा लोग इन चौरासी आसनों का अभ्यास करते हैं। पर साधारण जीवन में ब्रह्मचर्य्य ब्रत पालन के लिए इन सभी आसनों का प्रयोग आवश्यक नहीं है। इस लिए हम यहाँ पर उन्हीं मुख्य आसनों का वर्णन करेंगे, जिनसे ब्रह्मचर्य्य-रक्षा में अपेक्षित सहायता मिल जाती है।

(१) सिद्धासन

पहले पलथी मारकर बैठ जाइये। फिर बाँये पैर की एड़ी को गुदा और अण्डकोपों के मध्य में, मज्जवृत्ती के साथ जमा दीजिये इसके बाद दाहिने पैर की एड़ी को लिंग के ऊपर, मूल में, जमा दीजिये। ठोड़ी को हृदय में, अर्थात् कंठमूल से थोड़ी दूर लगाइये और स्थिर होकर शरीर को सीधा कीजिये, फिर भौहों के मध्य में दृष्टि को ऐसा स्थिर कीजिये कि पलक और नेत्र विलकुल हिल-डुल न सकें। हाथों को घुटनी पर रख लीजिये। दोनों पैर एक दूसरे पर इस तरह आ जाने चाहिये कि दोनों की संधि-स्थान की हड्डियाँ ठीक एक दूसरे पर आ जायँ। इस समय श्वास-प्रहरण और श्वास-त्याग की क्रियायें बहुत धीरे-धीरे शान्ति के साथ होनी चाहिये। इस आसन का अभ्यास करते समय इस बात का ध्यान

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