भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 199 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 182

१६६]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

पातञ्जल योग-सूत्र में योग के आठ अङ्ग बतलाये हैं। यथा— “यमनियमासनं प्राणायाम, प्रत्याहार धारणाध्यान । समाधियोऽष्टावङ्गानि” ॥

अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारण, ध्यान और समाधि। इनमें भी आसन, प्राणायाम, धारण, ध्यान और समाधि ये पांच अंग ही मुख्य माने गये हैं। प्राचीन काल में हमारे देश में थोड़ा बहुत योग का अभ्यास रखने का प्रचलन था। इसी कारण उस काल में हमारे पूर्वज मानसिक और शारीरिक बल प्राप्त करके पूर्ण स्वस्थ रहते और पूर्णायु को प्राप्त होते थे। जिन रोगों पर औषधियाँ काम न देती थीं, योग-साधन से वे उन रोगों से भी मुक्त हो जाते थे। अविद्या से ज्यों ज्यों शनैः शनैः योग-विद्या का लोप होता गया, देशवासियों ने स्वास्थ्य और फलतः दीर्घायु का दिवाला निकाल दिया। आसन और प्राणायाम योग के सब से मुख्य अङ्ग माने गये हैं। कितने खेद की बात है कि इन दोनों के दोनों योग-साधनों का लोप सा हो गया है। अनेक धार्मिक सज्जन महानुभाव प्राणायाम तो येन केन प्रकारेण कर भी लेते हैं, पर योगासनों का तो सर्वथा लोप हो गया है। पर प्राणायाम आत्म-शुद्धि के लिए जितना आवश्यक है, योगासन शारीरिक विकास के लिए उससे भी अधिक उपयोगी है। कहा भी है—

“आसनानि समस्तान, सावन्तो जीव जन्तवः चतुरशीति लक्षाणि, शिवेनकथितंपुरा ॥

योगासनों का अभ्यास शौच, स्नान, व्यायाम आदि से निपट कर बिना कुछ खाये-पिये, प्रातःसायं ऐसे स्थान पर करना चाहिये,

ब्रह्मचर्य ही जीवन है · पृष्ठ 182, कुल 199 में से · BharatKosha