भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 199 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 181

❁ परिशिष्ट ❁

[१६९]

परिशिष्ट

योग-चिकित्सा

ब्रह्मचर्य्य ब्रत पालन के विषय में पिछले परिच्छेदों में सब कुछ लिखा जा चुका है। परन्तु हमारे कुछ कुपालु पाठकों तथा मित्रों ने हमें सम्मति दी है कि इसमें योग-चिकित्सा विषय पर भी एक अध्याय होना चाहिये। विचार करने पर हमें भी उनकी सम्मति उचित प्रतीत हुई। इसलिए हम यहाँ पर ब्रह्मचर्य्य ब्रतपालन के लिए, योग-चिकित्सा के विषय में भी कुछ वता देना आवश्यक समझते हैं।

हमारे प्राचीन सद्गुरुओं में योगाभ्यास की बड़ी महिमा वर्णित है। योगाभ्यास से शरीर के समस्त दोष दूर हो जाते हैं। यही नहीं, हमारे प्राचीन साहित्य में तो इस बात तक के प्रमाण मिलते हैं कि हमारे पूर्वज ऋषियों ने मृत्यु तक को, इसी योगाभ्यास द्वारा जीत लिया था। हमारा अतीत इतिहास यह प्रमाणित करता है कि हमारे पूर्वज इच्छानुसार दीर्घायु लाभ करते रहे हैं। आज कल जब कभी हम सुनते हैं कि अमुक पुरुष की आयु सौ वर्ष से अधिक की है तो हमको आश्चर्य सा होता है। पर हम इस बात का विचार नहीं करते कि हमारे पूर्वजों की आयु तो प्रायः सौ वर्ष से ऊपर हुआ करती थी। बात यह है कि हमारे पूर्वज योगाभ्यास करते हुए इच्छानुसार स्वास्थ्य लाभ करते थे। ऐसी दशा में दीर्घायु प्राप्त होना क्या कठिन था ?