ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
“वचाओ उसे जोश जी मैं भरो, उठो भाइयो ! वीयंरत्ना करो ॥४॥
वीयंरत्ना ही आत्मोद्धार है । वीयंरत्ना ही देशोद्धार है !! वीयंरत्ना ही स्वर्गोद्धार है !!! संपूर्ण गुलामियों से मुक्ति पाने का एक मात्र दिव्य साधन है ।
“किस काम की नदी वह जिसमें नहीं खानी । जो जोश हो न हो तो किस काम की खानी ॥१॥
वस प्यारे ! सब की जड़ एक मात्र ब्रह्मचर्य ही है । ब्रह्मचर्य ही से ब्रह्म की प्राप्ति होती है और ब्रह्मचर्य ही से मनुष्य काल को जीत लेता है । इसके लिये वेद का प्रमाण—
“ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाव्रत । इन्द्रोह ब्रह्मचर्येण देवेश्यः स्वराभरत ॥ १ ॥ अथर्ववेद १-५-१९
“ऋषियों ने ब्रह्मचर्य के तप ही से मृत्यु को जीत लिया और ब्रह्मचर्य ही से उन्हें आत्मप्रकाश भी हुआ है अर्थात् वे ईश्वरत्व को प्राप्त हुये हैं ।”
“उत्तिष्ठत ! जाग्रत !!-प्राप्यंवराभिबोधत !!! “उठो ! जागो !! और सद्बोध रूपी, इस महाप्रसाद का यथेष्ठ सेवन करो !!! ॐ शान्तिः पुष्टिस्तुष्टिश्चास्तु । ब्रह्मार्पणमस्तु !
ॐ ।