भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

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❁ हमारी भारत माता ❁

[ १६३ ]

“वीर्यही में वीरता है ! बाहुबल है !! राज्य है !!!

आत्मबल❁ में मुक्तता है ! और मारगत्याज्य है ॥ ६ ॥

अतएव ऐ वीर-पुत्रो ! अब ऐसा सुदीपन छोड़ दो ! स्वयं अपने पूर्वजों की तरह ब्रह्मचर्य धारण कर, वीर्यवान् और नरसिंह बन कर अपनी दुःखी माता को अब तत्काल मुक्त करो व मुक्त करके उसे उसके पूर्व वैभवयुक्त स्वातंत्र्य-सिंहासन पर आदरपूर्वक विठला दो । अहह ! क्या ही वह आनन्द का दिन होगा ! प्रभो ! अब कृपा करो और “वह शुभ दिन” अति शीघ्र दिखलाओ !

परमात्मा तुम्हें सुबुद्धि तथा बल प्रदान करे ऐसा हमारा आप को पूर्ण प्रेमाशीर्वाद है ।

“पद्य”

“वताओ मुझे देश कोई कहीं, इसी हिन्द का हो ऋणी जो नहीं ॥ १ ॥

“जहाँ ये भीष्म भीम जैसे बली । सुखी, दीर्घजीवी, शुची, निच्छृंखली ॥ २ ॥

“रहा विश्व में जो बड़े से बड़ा । वही देश ! हा ! आज नीचे पड़ा ॥ ३ ॥

*आत्मबल यानी अपना बल, सच्ची स्वतन्त्रता अपने ही बाहुबल से मेल सकती है और चिरकाल तक उपभोगी जा सकती है ! दूसरों के बल : मिली हुई स्वतन्त्रता परतन्त्रता के तुल्य ही होती है; क्योंकि वह विना आत्मबल के— अपने बल के— बहुत काल तक अपने पास रह ही नहीं कती ! सारांश “बल में बल अपना ही बल !”