भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

रही है। भाइयों ! अपनी इस परमप्यारी भारत माता को अब दास्य से मुक्त कीजिये, उसका वैभव उसे पुनः प्राप्त कर दीजिये ! भारत की स्वतंत्रता एक मात्र हमारी स्वतंत्रता के ऊपर सर्वथा निर्भर है और हमारी स्वतंत्रता एक मात्र विपय की गुलामी छोड़ने में अर्थात् पूर्वजों की तरह वीर्य धारण करने ही में है।

जैसे कोई गत-वैभव असहाय विधवा अपने एकलौते पुत्र पर सुख की आशा रखकर दुःख में दिन बिताती है, उसी प्रकार यह परम दुखी भारत-माता भी तुम जैसे बालकों पर सुख की आशा रखकर जीवन धारण किये हुये है और बड़े कष्ट व आपदा को सह रही है। वह अब कहां तक धीरे पंकड़ेगी मालूम नहीं।

चेतावनी

“तू सिंहशावक हिन्दवालक ! छोड़ अपनी भीरुता । पूर्वजों के तुल्य जग में अब दिखा दे वीरता ॥ १ ॥

“वीर्य ही में वीरता है वीर्य धारण अब करो । आर्यमाता दास्य में है दुःख उसका तुम हरो ॥ २ ॥

“प्राणधारण कर रही है बाट अपनी हूँठ रही । हाय ! तौ भी हिन्दजनता विपयसुखमें सो रही ॥ ३ ॥

“घोर निद्रा छोड़ करके जग उठो अब एक दम । आर्यपुत्रो ! शीघ्रता से अब बंदाओ निज कदम ॥

“दासता से मृत्यु अच्छी दीनता को फेंक दो । राज्य अपना आत्म-बल से प्राप्त कर दिखलाय दो ॥

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