भारतकोश
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ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

❁ परिशिष्ट ❁

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परिशिष्ट

योग-चिकित्सा

ब्रह्मचर्य्य ब्रत पालन के विषय में पिछले परिच्छेदों में सब कुछ लिखा जा चुका है। परन्तु हमारे कुछ कुपालु पाठकों तथा मित्रों ने हमें सम्मति दी है कि इसमें योग-चिकित्सा विषय पर भी एक अध्याय होना चाहिये। विचार करने पर हमें भी उनकी सम्मति उचित प्रतीत हुई। इसलिए हम यहाँ पर ब्रह्मचर्य्य ब्रतपालन के लिए, योग-चिकित्सा के विषय में भी कुछ वता देना आवश्यक समझते हैं।

हमारे प्राचीन सद्गुरुओं में योगाभ्यास की बड़ी महिमा वर्णित है। योगाभ्यास से शरीर के समस्त दोष दूर हो जाते हैं। यही नहीं, हमारे प्राचीन साहित्य में तो इस बात तक के प्रमाण मिलते हैं कि हमारे पूर्वज ऋषियों ने मृत्यु तक को, इसी योगाभ्यास द्वारा जीत लिया था। हमारा अतीत इतिहास यह प्रमाणित करता है कि हमारे पूर्वज इच्छानुसार दीर्घायु लाभ करते रहे हैं। आज कल जब कभी हम सुनते हैं कि अमुक पुरुष की आयु सौ वर्ष से अधिक की है तो हमको आश्चर्य सा होता है। पर हम इस बात का विचार नहीं करते कि हमारे पूर्वजों की आयु तो प्रायः सौ वर्ष से ऊपर हुआ करती थी। बात यह है कि हमारे पूर्वज योगाभ्यास करते हुए इच्छानुसार स्वास्थ्य लाभ करते थे। ऐसी दशा में दीर्घायु प्राप्त होना क्या कठिन था ?

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पातञ्जल योग-सूत्र में योग के आठ अङ्ग बतलाये हैं। यथा— “यमनियमासनं प्राणायाम, प्रत्याहार धारणाध्यान । समाधियोऽष्टावङ्गानि” ॥

अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारण, ध्यान और समाधि। इनमें भी आसन, प्राणायाम, धारण, ध्यान और समाधि ये पांच अंग ही मुख्य माने गये हैं। प्राचीन काल में हमारे देश में थोड़ा बहुत योग का अभ्यास रखने का प्रचलन था। इसी कारण उस काल में हमारे पूर्वज मानसिक और शारीरिक बल प्राप्त करके पूर्ण स्वस्थ रहते और पूर्णायु को प्राप्त होते थे। जिन रोगों पर औषधियाँ काम न देती थीं, योग-साधन से वे उन रोगों से भी मुक्त हो जाते थे। अविद्या से ज्यों ज्यों शनैः शनैः योग-विद्या का लोप होता गया, देशवासियों ने स्वास्थ्य और फलतः दीर्घायु का दिवाला निकाल दिया। आसन और प्राणायाम योग के सब से मुख्य अङ्ग माने गये हैं। कितने खेद की बात है कि इन दोनों के दोनों योग-साधनों का लोप सा हो गया है। अनेक धार्मिक सज्जन महानुभाव प्राणायाम तो येन केन प्रकारेण कर भी लेते हैं, पर योगासनों का तो सर्वथा लोप हो गया है। पर प्राणायाम आत्म-शुद्धि के लिए जितना आवश्यक है, योगासन शारीरिक विकास के लिए उससे भी अधिक उपयोगी है। कहा भी है—

“आसनानि समस्तान, सावन्तो जीव जन्तवः चतुरशीति लक्षाणि, शिवेनकथितंपुरा ॥

योगासनों का अभ्यास शौच, स्नान, व्यायाम आदि से निपट कर बिना कुछ खाये-पिये, प्रातःसायं ऐसे स्थान पर करना चाहिये,

❁ सिद्धासन ❁

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जहाँ शुद्ध वायु विपुलता से आती हो और प्रकाश भी पर्याप्त हो। यों तो योगासन अगणित हैं। योनियों की संख्या चौरासी लाख है। योनियों की संख्या के अनुसार ही चौरासी लाख योगासन योगिराज भगवान् शङ्कर ने बतलाये हैं; पर उनमें चौरासी मुख्य हैं। योगी और महात्मा लोग इन चौरासी आसनों का अभ्यास करते हैं। पर साधारण जीवन में ब्रह्मचर्य्य ब्रत पालन के लिए इन सभी आसनों का प्रयोग आवश्यक नहीं है। इस लिए हम यहाँ पर उन्हीं मुख्य आसनों का वर्णन करेंगे, जिनसे ब्रह्मचर्य्य-रक्षा में अपेक्षित सहायता मिल जाती है।

(१) सिद्धासन

पहले पलथी मारकर बैठ जाइये। फिर बाँये पैर की एड़ी को गुदा और अण्डकोपों के मध्य में, मज्जवृत्ती के साथ जमा दीजिये इसके बाद दाहिने पैर की एड़ी को लिंग के ऊपर, मूल में, जमा दीजिये। ठोड़ी को हृदय में, अर्थात् कंठमूल से थोड़ी दूर लगाइये और स्थिर होकर शरीर को सीधा कीजिये, फिर भौहों के मध्य में दृष्टि को ऐसा स्थिर कीजिये कि पलक और नेत्र विलकुल हिल-डुल न सकें। हाथों को घुटनी पर रख लीजिये। दोनों पैर एक दूसरे पर इस तरह आ जाने चाहिये कि दोनों की संधि-स्थान की हड्डियाँ ठीक एक दूसरे पर आ जायँ। इस समय श्वास-प्रहरण और श्वास-त्याग की क्रियायें बहुत धीरे-धीरे शान्ति के साथ होनी चाहिये। इस आसन का अभ्यास करते समय इस बात का ध्यान

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रखना आवश्यक है कि पीठ की रीढ़ सीधी रहे। पीठ की रीढ़ में शरीर की सारी नसें फैली हुई हैं। इसी को मेरुदंड कहते हैं। शरीर का यही मूलाधार है। साधारण रूप से चलते फिरते समय भी इसको सीधा रखना चाहिये।

यह आसन एक मास के निरन्तर अभ्यास से लाभप्रद सिद्ध होता है। पर इस आसन का अतिशय अभ्यास हानिकारक भी होता है क्योंकि यह आसन कामोत्तन का नाशक है। अतिशय अभ्यास से इसका प्रभाव सन्तानोत्पादन शक्ति को इतना क्षीण बना देता है कि काम बिल्कुल शान्त पड़ जाता है। और पुरुष स्त्री के काम का नहीं रह जाता। पर इस भय से इस आसन का करना ही स्थगित कर देना ठीक नहीं है। ब्रह्मचर्य के लिए यह आसन अतीव लाभकर है। अंति तो सर्वत्र और सर्वदा वर्जित है। इसलिए इसका थोड़ा अभ्यास अवश्य रखना चाहिये।

(२) पद्मासन

इस आसन में भी पहले पलथी मारकर बैठ जाइये, फिर दाहिने पैर को बाईं जाँघ पर और बायें पैर को दाहिनी जाँघ पर जमा दीजिये। फिर बायां हाथ बायें घुटने पर और दाहिना हाथ दायें घुटने पर रखिये। इस आसन में पीठ, गला, स्तर, रीढ़ बिल्कुल सीध में होनी चाहिये। अपनी दृष्टि को भौहों के बीच या नासिका पर लगा देना चाहिये।

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

चित्र नम्बर १

A black and white line drawing of a man sitting cross-legged in a meditative posture. He is shirtless and wears a beaded necklace. His hands are clasped together in his lap. He has a mustache and a small crown-like headpiece. The drawing is simple and stylized.

सिद्धासन

❁ प्रहसचर्य ही जीवन है ❁

चित्र नम्बर २

जानुशिरासन

❁ जानु शिरासन ❁

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(३) जानु शिरासन

इस आसन में पहले दोनों पावों को जमीन पर समान रेखा में फैला दीजिये। पाँव जमीन से इस तरह चिपके रहने चाहिये कि बिल्कुल उठ न सकें। इसके बाद किसी एक पैर को गुदा और अण्डकोण के बीच में लाकर उसकी एड़ी को वहाँ इस तरह जमा दीजिये कि उस पैर का पंजा और तलवा दूसरे पैर के जंघा से बिल्कुल चपक जाय। और उसका दबाव भी बराबर पड़ता जाय। इसके बाद दोनों की कैंची बनाकर उन्हें फैले हुए पैर के तलबे के यहाँ ले जाइये। और उस पैर को इस तरह पकड़ लीजिये कि आपकी नाक ठीक उसी पैर के घुटने के ऊपर आ जाय। यह आसन पाँच मिनट से लगाकर आध घंटे तक, या जैसी सामर्थ्य हो, उसके अनुसार करना चाहिये।

यह आसन यदि पहले दाहिने पैर से कीजिए, तो फिर बायें पैर से। इसी तरह बदलते रहिये। इसमें भूल नहीं होनी चाहिये। भूल होने से हानि होगी। बात यह है कि दोनों पैरों का अभ्यास बराबर होना चाहिये। इसमें प्रत्येक बार समय भी समान लगना चाहिये।

यह आसन स्त्रियों के लिए नहीं है।

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

(४) पादांगुष्ठसन

इस आसन में किसी एक पैर की गेंड़ी को गुदा और अंडकोप के मध्यभाग में लगाकर शरीर के समस्त भार को उसी पर छोड़ दीजिये। दूसरे पैर को घुटने के ऊपर रखिये। अगर सहारे की आवश्यकता हो तो या तो एक हाथ का सहारा लीजिये, या दीवार का।

इस आसन का प्रभाव बहुत शीघ्र होता है। इसके अभ्यास से कैसा ही स्वप्रदोष हो दूर हो जाता है। पर इस आसन को ब्रह्मचारी ही को करना चाहिये। गृहस्थों के लिए इसका निरन्तर अभ्यास करना विशेष हितकर न होगा। स्त्रियों के लिए यह आसन वर्जित है।

(५) शीर्षासन

इस आसन में सिर के बल खड़ा होना होता है। इसलिए या तो एक गढ़ेला रख लेना चाहिये, या किसी वस्त्र की ऐसी गिंड़ई बना लेना चाहिये जो सिर के बल खड़े होने में सहायक हो। मतलब यह है कि इस आसन के समय सिर के नीचे सख्त जमीन नहीं होनी चाहिये। सख्त जमीन होने से मस्तिष्क पर दुष्प्रभाव पड़ने का भय रहता है। इसलिये यही अच्छा है कि इसका आसन बहुत मुलायम और गुदगुदे धरातल में करें। आरम्भ में यह आसन दीवाल का सहारा लेकर किया जाता है। अगर इस आसन को

❁ अन्नचर्यं ही जीवन है ❁

चित्र नम्बर ३

पादांगुष्ठासन

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

चित्र नम्बर ४

१ आसन ४

इस आसन में तो एक गढ़ेला रख ले बना लेना चाहिये जो मतलब यह है कि इस नहीं होनी चाहिये। सख्त का भय रहता है। इसलि मुलायम और गुदगुदे धर दीवाल का सहारा लेकर।

शीर्षासन

❁ शीर्षासन ❁

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करते समय प्रारम्भ में मित्रों से सहायता ली जाय तो भी अच्छा है।

इसमें पहले सिर को गढ़ले या गिंडुई में रखकर दोनों हाथों की कैंची बना कर सिर को अच्छी तरह साध लीजिये। फिर दोनों पैर को जमीन से बहुत धीरे धीरे उठाकर ऊपर आकाश में सीधे ले जाइये। पैरों को विलकुल सीधा रखिये।

इस आसन को पहले १०-१५ क्षणों से प्रारम्भ करना चाहिये। छः मास के अभ्यास के अनन्तर इसे आध घंटे तक लगाया जा सकता है। पर एक घंटे से अधिक इसे न करना चाहिये। इस आसन के कर लेने पर न तो लेटना चाहिये और न बैठना। जितनी देर इस आसन में लगी हो, उतनी ही देर विलकुल सीधा खड़ा रहना चाहिये। बात यह है कि इस आसन से शरीर की नसों का रुधिर-प्रवाह पहले थोड़ा रुकता है और फिर उल्टा प्रवाहित होने को होता है। इसमें मस्तिष्क को खूराक मिलती है और दिमागी ताकत बढ़ जाती है। जिस समय यह आसन किया जाता है उस समय मुँह एक दम लाल हो जाता है।

पहले तो यह आसन दीवाल के सहारे से ही प्रारम्भ होता है; फिर जब दीवाल के सहारे से इस आसन को करते हुए एक मास तक अभ्यास कर ले, तब बिना किसी का आश्रय लिए करना चाहिये। यह आसन शरीर के समस्त विकारों को नाश करता है। तरुणावस्था में जिन लोगों के बाल सफेद हो जाते हैं, यदि वे इसका छः मास भी अभ्यास करें तो उनके बाल फिर काले हो जायेंगे।

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विशेष सूचनाएँ

१—इन योगासनों का अभ्यास करते समय लघुपाक आहार अत्यन्त आवश्यक है। कंद, मूल तथा फलों का ही आहार किया जाय तब तो बहुत ही अच्छा हो, पर साधारण रूप से गौ का दूध, चावल, खिचड़ी, दलिया, गेहूँ के मोटे आटे की रोटी, मूँग की दाल देशी सक्कर, सायूदाने की खीर, सूखी मेवा तथा हरे फल खाने चाहिये।

२—इन आसनों की जो विधियाँ ऊपर बतलायी गई हैं वे यद्यपि कुछ बहुत कठिन नहीं हैं, तथापि बिना किसी अभ्यस्त शिक्क के इनका अभ्यास करने से लाभ के बदले प्रायः हानि भी हो जाती है। इसलिए इन्हें शिक्क या योगी से ही सीखना चाहिये।

३—इन आसनों का अभ्यास करते समय आस का निकालना और ग्रहण करना—ये दोनों क्रियायें बहुत धीरे धीरे होनी चाहिये।

४—यदि शरीर में वीर्य-सम्बन्धी कोई विकार हो तो इन आसनों का अभ्यास करते समय गुदा-संकोचन पर विशेष ध्यान रखना चाहिये। वीर्य-रक्षा का यह एक मात्र अन्यर्थ-महौषध है।

५—जो लोग विधिवत् ब्रह्मचारी नहीं हैं; अर्थात् जिनका विवाह हो गया है, वे भी इनका अभ्यास करके अपने शरीर को नीरोग बना सकते हैं। पर इन आसनों का अभ्यास करते समय हृद संयम के साथ वीर्य-रक्षा करना अनिवार्य रूप से आवश्यक है।

नवयुवकों को स्वर्गीय सन्देश पहुँचाने वाली

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( ५ )

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अयोध्या काण्ड—मू० १॥॥

आरण्य काण्ड—मू० ॥॥

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