भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ शीर्षासन ❁

[ १७१ ]

करते समय प्रारम्भ में मित्रों से सहायता ली जाय तो भी अच्छा है।

इसमें पहले सिर को गढ़ले या गिंडुई में रखकर दोनों हाथों की कैंची बना कर सिर को अच्छी तरह साध लीजिये। फिर दोनों पैर को जमीन से बहुत धीरे धीरे उठाकर ऊपर आकाश में सीधे ले जाइये। पैरों को विलकुल सीधा रखिये।

इस आसन को पहले १०-१५ क्षणों से प्रारम्भ करना चाहिये। छः मास के अभ्यास के अनन्तर इसे आध घंटे तक लगाया जा सकता है। पर एक घंटे से अधिक इसे न करना चाहिये। इस आसन के कर लेने पर न तो लेटना चाहिये और न बैठना। जितनी देर इस आसन में लगी हो, उतनी ही देर विलकुल सीधा खड़ा रहना चाहिये। बात यह है कि इस आसन से शरीर की नसों का रुधिर-प्रवाह पहले थोड़ा रुकता है और फिर उल्टा प्रवाहित होने को होता है। इसमें मस्तिष्क को खूराक मिलती है और दिमागी ताकत बढ़ जाती है। जिस समय यह आसन किया जाता है उस समय मुँह एक दम लाल हो जाता है।

पहले तो यह आसन दीवाल के सहारे से ही प्रारम्भ होता है; फिर जब दीवाल के सहारे से इस आसन को करते हुए एक मास तक अभ्यास कर ले, तब बिना किसी का आश्रय लिए करना चाहिये। यह आसन शरीर के समस्त विकारों को नाश करता है। तरुणावस्था में जिन लोगों के बाल सफेद हो जाते हैं, यदि वे इसका छः मास भी अभ्यास करें तो उनके बाल फिर काले हो जायेंगे।