भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 192, कुल 199 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 192

१७२ ]

❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

विशेष सूचनाएँ

१—इन योगासनों का अभ्यास करते समय लघुपाक आहार अत्यन्त आवश्यक है। कंद, मूल तथा फलों का ही आहार किया जाय तब तो बहुत ही अच्छा हो, पर साधारण रूप से गौ का दूध, चावल, खिचड़ी, दलिया, गेहूँ के मोटे आटे की रोटी, मूँग की दाल देशी सक्कर, सायूदाने की खीर, सूखी मेवा तथा हरे फल खाने चाहिये।

२—इन आसनों की जो विधियाँ ऊपर बतलायी गई हैं वे यद्यपि कुछ बहुत कठिन नहीं हैं, तथापि बिना किसी अभ्यस्त शिक्क के इनका अभ्यास करने से लाभ के बदले प्रायः हानि भी हो जाती है। इसलिए इन्हें शिक्क या योगी से ही सीखना चाहिये।

३—इन आसनों का अभ्यास करते समय आस का निकालना और ग्रहण करना—ये दोनों क्रियायें बहुत धीरे धीरे होनी चाहिये।

४—यदि शरीर में वीर्य-सम्बन्धी कोई विकार हो तो इन आसनों का अभ्यास करते समय गुदा-संकोचन पर विशेष ध्यान रखना चाहिये। वीर्य-रक्षा का यह एक मात्र अन्यर्थ-महौषध है।

५—जो लोग विधिवत् ब्रह्मचारी नहीं हैं; अर्थात् जिनका विवाह हो गया है, वे भी इनका अभ्यास करके अपने शरीर को नीरोग बना सकते हैं। पर इन आसनों का अभ्यास करते समय हृद संयम के साथ वीर्य-रक्षा करना अनिवार्य रूप से आवश्यक है।