ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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(३) जानु शिरासन
इस आसन में पहले दोनों पावों को जमीन पर समान रेखा में फैला दीजिये। पाँव जमीन से इस तरह चिपके रहने चाहिये कि बिल्कुल उठ न सकें। इसके बाद किसी एक पैर को गुदा और अण्डकोण के बीच में लाकर उसकी एड़ी को वहाँ इस तरह जमा दीजिये कि उस पैर का पंजा और तलवा दूसरे पैर के जंघा से बिल्कुल चपक जाय। और उसका दबाव भी बराबर पड़ता जाय। इसके बाद दोनों की कैंची बनाकर उन्हें फैले हुए पैर के तलबे के यहाँ ले जाइये। और उस पैर को इस तरह पकड़ लीजिये कि आपकी नाक ठीक उसी पैर के घुटने के ऊपर आ जाय। यह आसन पाँच मिनट से लगाकर आध घंटे तक, या जैसी सामर्थ्य हो, उसके अनुसार करना चाहिये।
यह आसन यदि पहले दाहिने पैर से कीजिए, तो फिर बायें पैर से। इसी तरह बदलते रहिये। इसमें भूल नहीं होनी चाहिये। भूल होने से हानि होगी। बात यह है कि दोनों पैरों का अभ्यास बराबर होना चाहिये। इसमें प्रत्येक बार समय भी समान लगना चाहिये।
यह आसन स्त्रियों के लिए नहीं है।