भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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(४) पादांगुष्ठसन

इस आसन में किसी एक पैर की गेंड़ी को गुदा और अंडकोप के मध्यभाग में लगाकर शरीर के समस्त भार को उसी पर छोड़ दीजिये। दूसरे पैर को घुटने के ऊपर रखिये। अगर सहारे की आवश्यकता हो तो या तो एक हाथ का सहारा लीजिये, या दीवार का।

इस आसन का प्रभाव बहुत शीघ्र होता है। इसके अभ्यास से कैसा ही स्वप्रदोष हो दूर हो जाता है। पर इस आसन को ब्रह्मचारी ही को करना चाहिये। गृहस्थों के लिए इसका निरन्तर अभ्यास करना विशेष हितकर न होगा। स्त्रियों के लिए यह आसन वर्जित है।

(५) शीर्षासन

इस आसन में सिर के बल खड़ा होना होता है। इसलिए या तो एक गढ़ेला रख लेना चाहिये, या किसी वस्त्र की ऐसी गिंड़ई बना लेना चाहिये जो सिर के बल खड़े होने में सहायक हो। मतलब यह है कि इस आसन के समय सिर के नीचे सख्त जमीन नहीं होनी चाहिये। सख्त जमीन होने से मस्तिष्क पर दुष्प्रभाव पड़ने का भय रहता है। इसलिये यही अच्छा है कि इसका आसन बहुत मुलायम और गुदगुदे धरातल में करें। आरम्भ में यह आसन दीवाल का सहारा लेकर किया जाता है। अगर इस आसन को