भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 199 में से

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❁ ब्रह्मचर्य्ये ही जीवन है ❁

साधुन से वह नेत्र के काले धव्वे निकल सकेंगे ? कदापि नहीं ! सभ्य स्त्री-पुरुष या बालक को अपनी ऐसी पतित दशा देखकर— अपना काला मुँह देखकर 'निःसंदेह वड़ा ही दुख होगा—उन्हें कृत कर्मों' का पछतावा होगा । प्रिय मित्रो ! तुम्हें यदि सच्चा पछतावा होता हो तो हम आप को इसकी अत्यन्त सुलभ आप्धि बतलाते हैं कि "वीर्य-रक्षा करो" वस, यही इसकी सुलभ व अनुभव-सिद्ध आप्धि है । जितना अधिक तुम वीर्य धारण करोगे उतना ही अधिक तुम्हारा मुँह उज्ज्वल बनता जायगा । आँखों की वह कालिमा नष्ट होती जायगी और जितना अधिक तुम वीर्य-नाश करोगे उतना ही अधिक तुम्हारा मुँह काला बनता जायगा । यदि तुम छः ही मास वीर्य-संग्रह करोगे तो तुम्हारे तन, मन दोनों पवित्र बन जायेंगे और चेहरा स्वच्छ बन जायगा, पूर्ण विश्वास रखो । जब से तुम वीर्य धारण करने लगे तब से ऐसी 'हृद भावना' रखो किः— "हमारे नेत्र स्वच्छ हो रहे हैं ।" ( नेत्र पर से हाथ घुमाकर कहो कि—) अब कालिमा नष्ट हो रही है । सूर्य के माफिक मेरे नेत्र तेज संपन्न हो रहे हैं । मेरी दृष्टि पवित्र हो रही है—पाप दृष्टि नष्ट हो रही है । मैं निष्पाप हूँ ! पवित्र हूँ !! तेजस्वी हूँ !!!" इत्यादि । तुम इस ग्रन्थ में के दिव्य नियमानुसार चलने से वीर्य-रक्षा प्रतिज्ञापूर्वक कर सकते हो, ऐसा हमारा अत्यन्त हृद अनुभव है । प्राणायाम से दृष्टि अत्यंत तीव्र होती है । हाँ, कीर्ति की तथा आत्मोद्धार की सच्ची इच्छा जरूर होनी चाहिये । 'लोक निन्दा का भय वीर्यनाशकारिणी कुवृत्तियों को रोकने के लिये अति उत्तम उपाय है'—ऐसा सज्जनों का अनुभव है ।

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