भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ लोक-निन्दा का भय ❁

[ १५३ ]

वह दव जाती है, अंब कहो ! फिर स्कास्थ्य की आशा कहाँ ? साइकिल पर बैठने से जननेन्द्रिय की निचली नसों पर बड़ा कठोर दबाव पड़ता है, जिससे मनुष्य का पुरुष-बल घटने लगता है । साइकिल पर विशेष बैठने वाले विशेष नामर्द एवं नपुंसक होते हैं ।

आराम-तलब पुरुष सात जन्म में भी ब्रह्मचारी नहीं हो सकता । और इस बात को पता धनी लोगों पर दृष्टि डालने से तत्काल लगता है । धनी पुरुष हमेशा बहुत दुःखी, बड़े लंगड़े और बहुत काम के कारण बेकाम बने हुए होते हैं । वे सदा सर्वदा रोगी ही बने रहते हैं । हे भगवन ! पैदल टहलने का महत्व इन लोगों के ध्यान में कब आवेगा और उनका तथा देश का उद्धार कब होगा ? हमें अब शीघ्र जागृत कीजिए, यही आप से हमारी नम्र प्रार्थना है !

“लोक-निन्दा का भय”

नियम तेईसवाँ :—

इस ग्रन्थ में वर्णन किए हुए “वीर्य-नाश के कुछ मुख्य लक्षण” बार बार पढ़ो और शीशे में अपना मुंह ज़रा देखो । घमण्डी बनने के भाव से नहीं, किन्तु घमण्ड को दूर करने के भाव से देखो । यदि तुम्हारे नेत्र, नाक के कोने के पास काले होने लगे हों तो उन्हें वीर्य के नाश से और भी काले मत बनाओ और फिर अपना काला मुँह लेकर अकड़ कर समाज में न घूमो; बुद्धिमान पुरुष तुम्हें देखते ही पहचान लेंगे कि तुम कितने बरबाद हुए हो; भला अब इस ग्रथ को पढ़ने वाले पुरुष से तम छिप सकोगे ? क्या