ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
जाते हैं, परन्तु प्रेमी मनुष्य उस वेचारे का पिण्ड नहीं छोड़ते । फिर रोग व कामरिपु भी ऐसे पुरुष का पिण्ड नहीं छोड़ते । यद्यपि बाहर से तेल-पानी और सज-धज के कारण ऐसा पुरुष वेश्या की तरह सुन्दर दिखाई देता हो, परन्तु उसका वह सौंदर्य गुप्त-रोग व पाप से भरा रहता है और इस बात की सत्यता थोड़ा सा निष्पक्ष आत्म-संशोधन करने से तत्काल मालूम होती है । अस्तु ।
सभी जगह पवित्रता आवश्यक है, इसमें कोई संदेह नहीं । खड़ाऊँ से मनोविकार शान्त होते हैं, वह हमारा अनुभव है; तथा दृष्टि भी सतेज होती है । पर हाँ, ऐसा रही खड़ाऊँ न पहिनना चाहिये। जिससे कष्ट हो, खड़ाऊँ हल्का व सुखप्रद होना चाहिये । खड़ाऊँ का अच्छापन अथवा बुरापन उसकी खूँटी पर सर्वथा निर्भर है । अतः खूँटियों की गुण्डियाँ चौड़ी तथा सुखावह हों ।
“पैदल चलना”
नियम बाईसवाँ :—
ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये पैदल चलना आवश्यक बात है । व्यर्थ थोड़ी थोड़ी बात के लिये व थोड़ी दूर के लिये विना आवश्यकता के गाड़ी घोड़े, एक्का, टॉगा, साइकिल इत्यादि पर चढ़ना निःसन्देह ब्रह्मचर्य से नीचे गिरना है । साइकिल पर बैठने से तो ब्रह्मचर्य तथा स्वास्थ्य को बहुत हानि होती । कैसी ही दिशा मालूम होती हो परन्तु एक मील तक साइकिल पर बैठ के जाने से ही