भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ लंगोट बंद रहना ❁

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“लंगोट बंद रहना”

नियम बोसवॉः —

वीर्यरक्षा के लिये सदा सर्वदा लंगोट कसे रहना बहुत ही उपकारी है लंगोट से मन शान्त होता है व अण्डकोप बढ़ने नहीं पाते । लंगोट दोहरा नहीं बल्कि एकहरा ही होना चाहिये जिससे अनावश्यक गर्मी के कारण वीर्यनाश न हो । लंगोट पहनने से पुरुषत्व घटता नहीं, बल्कि अधिक शुद्ध व अत्यन्त नियम-बद्ध होता है—इस बात को लंगोट से डरने वालों को स्मरण रखना चाहिये, क्योंकि यह हमारा क्रीव २० वर्षों का स्वानुभव है ।

“खड़ाऊँ”

नियम इक्कीसवॉः —

पैर के अँगूठे के पास जो बड़ी नस है उसका व जननेन्द्रिय का बड़ा ही भारी लगाव है । वह नस यदि टूट जाय तो मनुष्य एक ही घंटे के भीतर मर जाता है । खड़ाऊँ से जब वह नस दबती है तब उसके साथ साथ काम-वासनायें भी दबने लगती हैं । जूते की गन्दगी से जो जिन्दगी का नाश होता है, सो खड़ाऊँ से नहीं होने पाता । अक्सर सर्दी-गर्मी व रोगादि पैर व शिर इन द्वारों से ही प्रवेश करते हैं । जूते में कितनी बढ़बू भरी रहती है इसका अनुभव जूते के पहनने वालों को भली भाँति होता है । इसी कारण ब्रह्म चारी को जूता पहनना सर्वथा मना है । जूते के टुकड़े टुकड़े उड़