भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ईश्वर भक्ति ❁

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“ईश्वर भक्ति”

नियम चौबीसवाँ :—

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।

साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्ब्यवसितोहि सः ॥१॥

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्चञ्चान्तिं निगच्छति ।

कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ २ ॥

—गीता अ० ६ श्लो० ३०—३१ ।

अर्थः—“कितने ही दुराचारी क्यों न हों; परन्तु यदि वह मुझे ‘एक निष्ठ भाव से’ भजता है तो उसे साधू ही समझना चाहिये; क्योंकि उसकी बुद्धि का निश्चय अच्छा हुआ है। वह बहुत शीघ्र धर्मात्मा होता है व चिर-शान्ति को प्राप्त होता है। हे कौन्तेय ! तू पूर्ण ध्यान में रख कि ‘मेरे भक्त को कभी अधोगति हो ही नहीं सकती।’”

संतप्त मन को शान्त करने के लिए और अपवित्र मन को पवित्र व सर्व श्रेष्ठ बनाने के लिए “भगवद्भक्ति” एक मात्र सब से श्रेष्ठ, सुलभ व सच्चा उपाय है। अन्य उपाय कष्टप्रद हैं। अतएव आत्म-शुद्ध्यर्थ भगवान का स्मरण, ध्यान, गान, आदि आप को रोज अवश्य ही करना होगा। जैसी हमारी भक्ति होगी वैसी ही हम में विरक्ति भी प्रकट होगी। “हरि व्यापक सर्वत्र समाना, प्रेम ते प्रकट होहि मैं जाना।” श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छुद्धः स एव सः।” यानी “मनुष्य श्रद्धामय है; जैसी उसकी श्रद्धा होती है

  • भक्तियोगेनमक्षिष्टोमद्भावायोपपद्यते ॥—भगवान् श्रीकृष्ण ॥