ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
ठीक वैसा ही बन जाता है” ऐसा भगवान का भी वचन है। क्रोधी भाव से क्रोधी, कामी भाव से कामी, अभिमानी भाव से अभिमानी, व्यभिचारी भाव से व्यभिचारी, प्रेमी भाव से प्रेमी; ब्रह्मचारी भाव से ब्रह्मचारी व ईश्वरीय भाव से मनुष्य भी निसन्देह ईश्वररूप बन जाता है। वास्तव में मन जिसका ध्यान करता है, वह तद्रूप ही बन जाता है। दोषवर्णन से मनुष्य जैसा दोषी बन जाता है, वैसे ही सदगुण वर्णन से मनुष्य भी निसन्देह सदगुणी बन जाता है। तब फिर भगवान् के गुण वर्णन करने से और उसी का नियम पूर्वक ध्यान करने से हम प्रत्यक्ष भगवद्रूप ही क्यों बन जायेंगे ? अवश्य बन जायेंगे। यदि हम हनुमान जी का ध्यान और गुणगान करेंगे तो हम भी उन्हीं के समान भक्त व ब्रह्मचारी अवश्य बन जायेंगे। अतएव ब्रह्मचारी को चित्त-शुद्धि के लिये रोज “नियम-पूर्वक सुबह शाम दोनों वक्त भगवद्भजन, पूजन, स्मरण ध्यान आदि अवश्यावश्य करना ही चाहिये; क्योंकि भगवान कहते हैं “मेरी भक्ति करने वाले मेरे ही स्वरूप में आकर मिलते हैं और स्त्री की भक्ति करने वाले स्त्री-रूप में वा शूकर कूकर के रूप में जा मिलते हैं। “विषय विरक्त” वस, इसी एक शब्द में संपूर्ण ब्रह्मचर्य का सार भरा हुआ है जो कि “भगवद्भक्ति” से हर किसी को सहज ही में “निसन्देह” प्राप्त होती है। आत्मोद्धार चाहने वालों को अवश्य अनुभव करना चाहिये।
भोजन के प्रत्येक कौर से जैसे भूख की शान्ति व शरीर की पुष्टि तथा कान्ति बढ़ती जाती है, वैसे ही ज्यों ज्यों भक्ति का सेवन किया जाता है, त्यों त्यों विरक्ति व मुक्ति भी मनुष्य को निसन्देह प्राप्त होती रहती है।