ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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संक्षेप में कहा जाय तो, विषय-वैराग्य ही भाग्य है और वही शान्ति का मूल है। आचार्य कहते हैं:—“दुखी सदा कः ?” सदा दुखी व अभागा कौन है ? “विषयानुरागी,” जो विषयासक्त है सो ! “शान्ति शान्तिमान्नोति नकाम कामी” भगवान कहते हैं:—“कामी पुरुष कदापि शान्त नहीं हो सकता,” विषयवासना ही संपूर्ण दुःखों को जड़ है और विषय-वैराग्य ही संपूर्ण सुखों की एक मात्र कुञ्जी है। और यह विषय-वैराग्य किंवा विषय विरक्ति भगवान की भक्ति से हमें निस्सन्देह प्राप्त होती है, ऐसा असंख्य महापुरुषों का तथा श्रीतुलसीदास जी जैसे कट्टर महाभक्त का स्वानुभाविक सिद्धान्त है—“प्रेम भक्ति जल-विद्युत् खग राई, अभ्यन्तर मल कवहु न जाई ।” अहह ! बहुत ही सत्य है
सत्य वचन अरु नम्रता परतिय मात समान' ।
इतने पर हरि ना मिलै तुलसीदास जमान ॥ १ ॥
अतः यदि हमें अपना उद्धार करना हो, अपने मन को दुरुस्त करना हो, परम शुद्ध व परम श्रेष्ठ बनाना हो, तो “रोज्ञ नित्य नियम पूर्वक” परम कृपालु परमात्मा का भजन, पूजन हमें अवश्य ही करना चाहिये। भगवद्भक्ति ही सब दुःखों से मुक्ति पाने का तथा चित्त शुद्धि का सर्वश्रेष्ठ उपाय है; और चित्त शुद्धि ही ब्रह्मचर्य का सच्चा रहस्य है।