ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
❁ ईश्वर भक्ति ❁
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संक्षेप में कहा जाय तो, विषय-वैराग्य ही भाग्य है और वही शान्ति का मूल है। आचार्य कहते हैं:—“दुखी सदा कः ?” सदा दुखी व अभागा कौन है ? “विषयानुरागी,” जो विषयासक्त है सो ! “शान्ति शान्तिमान्नोति नकाम कामी” भगवान कहते हैं:—“कामी पुरुष कदापि शान्त नहीं हो सकता,” विषयवासना ही संपूर्ण दुःखों को जड़ है और विषय-वैराग्य ही संपूर्ण सुखों की एक मात्र कुञ्जी है। और यह विषय-वैराग्य किंवा विषय विरक्ति भगवान की भक्ति से हमें निस्सन्देह प्राप्त होती है, ऐसा असंख्य महापुरुषों का तथा श्रीतुलसीदास जी जैसे कट्टर महाभक्त का स्वानुभाविक सिद्धान्त है—“प्रेम भक्ति जल-विद्युत् खग राई, अभ्यन्तर मल कवहु न जाई ।” अहह ! बहुत ही सत्य है
सत्य वचन अरु नम्रता परतिय मात समान' ।
इतने पर हरि ना मिलै तुलसीदास जमान ॥ १ ॥
अतः यदि हमें अपना उद्धार करना हो, अपने मन को दुरुस्त करना हो, परम शुद्ध व परम श्रेष्ठ बनाना हो, तो “रोज्ञ नित्य नियम पूर्वक” परम कृपालु परमात्मा का भजन, पूजन हमें अवश्य ही करना चाहिये। भगवद्भक्ति ही सब दुःखों से मुक्ति पाने का तथा चित्त शुद्धि का सर्वश्रेष्ठ उपाय है; और चित्त शुद्धि ही ब्रह्मचर्य का सच्चा रहस्य है।
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
“नियम नियमावली का पाठ”
नियम पचीसवाँ :—
रोज़ प्रातः इस ब्रह्मचर्य की नियमावली का अवलोकन व पठन करना कभी न भूलना चाहिये; क्योंकि इसी में ब्रह्मचर्य रक्षा का सार है—इसीमें चैतावनी है इसीमें ब्रह्मचर्य के संस्कार हैं। नियमावली को एक बार ‘प्रातःकाल में रोज़ देखो ? बहुत उपकार होगा। हम विश्वास दिलाते हैं कि यह आपका “नियम दर्शन वा पठन कभी निष्फल नहीं होगा,” तुम्हें वह अवश्य वलपूर्वक सन्मार्गपथ पर घसीट कर ले आवेगा। इतना ही नहीं बल्कि यदि कोई इस नियमावली का सतत एक वर्ष तक पाठ शुरू रखेगा तो उसमें क्या ही ऊँचे भाव पैदा होंगे इसका खुद उसी को अनुभव हो जावेगा, हाथ कंगन को आरसी क्या ? हम प्रतिज्ञापूर्वक कह सकते हैं कि यह पचीस नियम वा ‘ब्रह्मचर्य-नियम पचीसा’ मुद्दे को भी चैतन्यमयी बना सकता है ! वस ! इससे अधिक क्या कहें ! स्वयं अनुभव कीजिये ! ॐ ! इति !
१६—सम्पूर्ण सुधारों का दादा ब्रह्मचर्य
आजकल देश भर में शूरों की सेना बढ़ रही है। जिसे देखो वही व्याख्यानदाता और देशसुधारक बनता फिरता है। इधर-उधर मण्डूकमंडली का टर्न टर्न कोलाहल सुनाई दे रहा है। कागजी घोड़ों के खुरों की खनखनाहट जोर शोर से कानों में घुस रही है।
❁ सम्पूर्ण सुधारों का दादा ब्रह्मचर्य ❁
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ऐसा मालूम होता है मानों अब कोई बड़ा भारी कर्मवीर हमारी सहायता करने के लिये आ ही रहा है ! परन्तु देखते हैं क्या : “कुछ नहीं !” कोई देशभक्ति के बहाने, कोई देशकार्य के बहाने, कोई समाजस्थापन के बहाने, अपना अपना स्वार्थसाधन कर रहे हैं । कोई ऐसे उदार पुरुष हैं, कि विना पैसे लिये व्याख्यान ही नहीं देते ? भला ऐसे देशभक्तिशून्य वाक्य पंडितों से देश का क्या सुधार हो सकता है ? केवल बातों के लड्डुओं से कौन घृत हो सकता है ? हमें ऐसे/प्रत्यक्ष निःस्वार्थी कर्मवीरों की बड़ी भारी आवश्यकता है, जिनके केवल मुख ही नहीं, बल्कि संपूर्ण शरीर ही हमारे सच्चे कर्तव्य की हमें सच्ची शिक्षा दे सकते हैं । एक आदर्श पुरुष देश का जितना सुधार कर सकता है, उस सुधार का एक सहस्रांश भी सुधार हजारों निर्वीर्य वाक्यपंडित अपने आयु भर के कोरे व्याख्यानों से नहीं कर सकते ! व्याख्यानवाजी से कोई कदाचित् समझता हो कि भारत अब जाग उठा है, तो यह उसकी गलती है । भारत जैसा पहले था वैसा ही आज भी है; हिन्दुस्तान पहले की तरह आज भी ठण्डा ही है । विशेष फ़रक हुआ है सो यही कि वह पहले से आज अधिक बढ़बढ़ करने लगा है । भारत में प्रत्यक्ष निःस्वार्थी कर्मवीर बहुत ही कम दिखाई देते हैं; स्वयं दुराचारी, अत्याचारी व दम्भी होने पर भी अपने को सदाचारी और ब्रह्मचारी समझना तथा लोगों के नेता होने का दम भरना, इससे सुधार तो नहीं बल्कि भारत का विगाड़ ही अधिक हुआ है और होता है । वगैर नीतिवल के—चारित्र्यवल के—कोई पुरुष कदापि श्रेष्ठ व यशस्वी हो ही नहीं सकता, यह अटल सिद्धान्त है । और नीतिवल, चारित्र्यवल किंवा आत्मवल, विना ब्रह्मचर्य के धारण
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवत है ❁
किये समजम्म में भी प्राप्त नहीं हो सकता, यह भी उतना ही सत्य सिद्धान्त है। अपने को नेता समझने वाले बड़े बड़े लोग आज दो चार ही नहीं बल्कि सैकड़ों सुधारों के पीछे पड़े हैं। क्या सामाजिक, क्या धार्मिक, क्या व्यवहारिक, कोई भी सुधार क्यों न हो, परन्तु बिना इस एक विषय में अर्थात् ब्रह्मचर्य में सुधार किये, कोई भी सुधार कदापि चिरस्थायी व यशस्वी हो नहीं सकता यह सिद्धान्त वाक्य हमें हृदय पट में अंकित कर वा अपनी दृष्टि के समाने बड़े बड़े अक्षरों में टैंगवा कर रखना चाहिये और रोज उसका दर्शन करना चाहिये। चणिक सुधार किस काम का? पानी पर लकीरें खींचने से क्या मतलब व जड़ को छोड़ कर डाल और पत्तियों पर पानी छिड़कने से क्या लाभ? यह नितान्त सत्य है कि, सम्पूर्ण सुधारों की और यश की कुंजी एक मात्र ब्रह्मचर्य ही है। बिना वीर्यधारण किये कोई भी जाति कदापि उन्नत नहीं हो सकती। निवीर्य जाति दूसरों की सदा गुलाम ही बनी रहती है। यदि हमें गुलामी को जड़ मूल से हटाना हो, हमें स्वतंत्र, सुखी, सत्ताशाली और वैभवसम्पन्न बनना हो, और पहले की तरह पुनः श्रेष्ठ बनना हो तो हमें पहले के समान पुनः वीर्यसम्पन्न अवश्य ही बनना होगा ! बिना ब्रह्मचर्य धारण किये हम कदापि पूर्व वैभव प्राप्त नहीं कर सकते। ब्रह्मचर्य ही सम्पूर्ण उन्नति का वीज मंत्र है ! ब्रह्मचर्य ही सम्पूर्ण सुखों का निधान है !! ब्रह्मचर्य ही एक मात्र सम्पूर्ण सुधारों का दादा है !!!
❁ हमारी भारत माता ❁
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२०—हमारी भारत माता
अब स्पष्ट मालूम हो गया है कि केवल ब्रह्मचर्य धारण ही में हमारा तथा देश का सच्चा कल्याण है, पुनरुद्धार है। ब्रह्मचर्य ही से हम पुनः सिंह बन सकते हैं ब्रह्मचर्य ही से हम सभी को भयभीत कर सकते हैं, ब्रह्मचर्य ही से हम सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त कर सकते हैं ब्रह्मचर्य ही से हम स्वतंत्र तथा सम्पूर्ण जगत् के स्वामी बन सकते हैं, यही नहीं बल्कि ब्रह्मचर्य ही से हम परब्रह्म को भी वशीभूत कर सकते हैं फिर सामान्य लोगों की कथा ही क्या है।
जो भारत एक समय सिंह-तुल्य निर्भय, स्वतंत्र व बलिष्ठ था; जिसके गर्जन तर्जन से सम्पूर्ण दिग् मण्डल कांप उठता था, जिसके तरफ कोई भी राष्ट्र आँख उठा के नहीं देख सकता था, जिस भारत में मणि मौक्तिक के खिलौने हमारे हाथ में रहते थे, उसी भारत में आज हमारे हाथ में की रोटी का टुकड़ा भी छीन लूट कर और मार पीट कर दूसरे लोग ले जा रहे हैं और हमें भूखों मार रहे हैं ! हांय ! इससे बढ़कर और दुःखमय स्थिति कौन सी हो सकती है ? आज हम वकरी के माफिक बन गये हैं; जो आता है सोई हमें हलाल करता है। हम अपना सच्चा सिंह स्वरूप भूल गये हैं। हमारे में पूर्वजों का वीर्य नहीं दिखाई देता; हम आज निर्वीर्य से हो गये हैं।
ऐ मेरे परम प्रिय भाइयो और बहिनों ! अब आँखें खोलो ! जागो ! विषय की मोहनिद्रासे अति शीघ्र जागो। और अपनी तथा देश की स्थिति पर कृपादृष्टि डालो ! हमारी असहाय भारत माता आँसू-भरे नयनों से आशायुक्त अन्तःकरण से हमारी तरफ देख
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
रही है। भाइयों ! अपनी इस परमप्यारी भारत माता को अब दास्य से मुक्त कीजिये, उसका वैभव उसे पुनः प्राप्त कर दीजिये ! भारत की स्वतंत्रता एक मात्र हमारी स्वतंत्रता के ऊपर सर्वथा निर्भर है और हमारी स्वतंत्रता एक मात्र विपय की गुलामी छोड़ने में अर्थात् पूर्वजों की तरह वीर्य धारण करने ही में है।
जैसे कोई गत-वैभव असहाय विधवा अपने एकलौते पुत्र पर सुख की आशा रखकर दुःख में दिन बिताती है, उसी प्रकार यह परम दुखी भारत-माता भी तुम जैसे बालकों पर सुख की आशा रखकर जीवन धारण किये हुये है और बड़े कष्ट व आपदा को सह रही है। वह अब कहां तक धीरे पंकड़ेगी मालूम नहीं।
चेतावनी
“तू सिंहशावक हिन्दवालक ! छोड़ अपनी भीरुता । पूर्वजों के तुल्य जग में अब दिखा दे वीरता ॥ १ ॥
“वीर्य ही में वीरता है वीर्य धारण अब करो । आर्यमाता दास्य में है दुःख उसका तुम हरो ॥ २ ॥
“प्राणधारण कर रही है बाट अपनी हूँठ रही । हाय ! तौ भी हिन्दजनता विपयसुखमें सो रही ॥ ३ ॥
“घोर निद्रा छोड़ करके जग उठो अब एक दम । आर्यपुत्रो ! शीघ्रता से अब बंदाओ निज कदम ॥
“दासता से मृत्यु अच्छी दीनता को फेंक दो । राज्य अपना आत्म-बल से प्राप्त कर दिखलाय दो ॥
❁ हमारी भारत माता ❁
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“वीर्यही में वीरता है ! बाहुबल है !! राज्य है !!!
आत्मबल❁ में मुक्तता है ! और मारगत्याज्य है ॥ ६ ॥
अतएव ऐ वीर-पुत्रो ! अब ऐसा सुदीपन छोड़ दो ! स्वयं अपने पूर्वजों की तरह ब्रह्मचर्य धारण कर, वीर्यवान् और नरसिंह बन कर अपनी दुःखी माता को अब तत्काल मुक्त करो व मुक्त करके उसे उसके पूर्व वैभवयुक्त स्वातंत्र्य-सिंहासन पर आदरपूर्वक विठला दो । अहह ! क्या ही वह आनन्द का दिन होगा ! प्रभो ! अब कृपा करो और “वह शुभ दिन” अति शीघ्र दिखलाओ !
परमात्मा तुम्हें सुबुद्धि तथा बल प्रदान करे ऐसा हमारा आप को पूर्ण प्रेमाशीर्वाद है ।
“पद्य”
“वताओ मुझे देश कोई कहीं, इसी हिन्द का हो ऋणी जो नहीं ॥ १ ॥
“जहाँ ये भीष्म भीम जैसे बली । सुखी, दीर्घजीवी, शुची, निच्छृंखली ॥ २ ॥
“रहा विश्व में जो बड़े से बड़ा । वही देश ! हा ! आज नीचे पड़ा ॥ ३ ॥
*आत्मबल यानी अपना बल, सच्ची स्वतन्त्रता अपने ही बाहुबल से मेल सकती है और चिरकाल तक उपभोगी जा सकती है ! दूसरों के बल : मिली हुई स्वतन्त्रता परतन्त्रता के तुल्य ही होती है; क्योंकि वह विना आत्मबल के— अपने बल के— बहुत काल तक अपने पास रह ही नहीं कती ! सारांश “बल में बल अपना ही बल !”
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
“वचाओ उसे जोश जी मैं भरो, उठो भाइयो ! वीयंरत्ना करो ॥४॥
वीयंरत्ना ही आत्मोद्धार है । वीयंरत्ना ही देशोद्धार है !! वीयंरत्ना ही स्वर्गोद्धार है !!! संपूर्ण गुलामियों से मुक्ति पाने का एक मात्र दिव्य साधन है ।
“किस काम की नदी वह जिसमें नहीं खानी । जो जोश हो न हो तो किस काम की खानी ॥१॥
वस प्यारे ! सब की जड़ एक मात्र ब्रह्मचर्य ही है । ब्रह्मचर्य ही से ब्रह्म की प्राप्ति होती है और ब्रह्मचर्य ही से मनुष्य काल को जीत लेता है । इसके लिये वेद का प्रमाण—
“ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाव्रत । इन्द्रोह ब्रह्मचर्येण देवेश्यः स्वराभरत ॥ १ ॥ अथर्ववेद १-५-१९
“ऋषियों ने ब्रह्मचर्य के तप ही से मृत्यु को जीत लिया और ब्रह्मचर्य ही से उन्हें आत्मप्रकाश भी हुआ है अर्थात् वे ईश्वरत्व को प्राप्त हुये हैं ।”
“उत्तिष्ठत ! जाग्रत !!-प्राप्यंवराभिबोधत !!! “उठो ! जागो !! और सद्बोध रूपी, इस महाप्रसाद का यथेष्ठ सेवन करो !!! ॐ शान्तिः पुष्टिस्तुष्टिश्चास्तु । ब्रह्मार्पणमस्तु !
ॐ ।
❁ परिशिष्ट ❁
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परिशिष्ट
योग-चिकित्सा
ब्रह्मचर्य्य ब्रत पालन के विषय में पिछले परिच्छेदों में सब कुछ लिखा जा चुका है। परन्तु हमारे कुछ कुपालु पाठकों तथा मित्रों ने हमें सम्मति दी है कि इसमें योग-चिकित्सा विषय पर भी एक अध्याय होना चाहिये। विचार करने पर हमें भी उनकी सम्मति उचित प्रतीत हुई। इसलिए हम यहाँ पर ब्रह्मचर्य्य ब्रतपालन के लिए, योग-चिकित्सा के विषय में भी कुछ वता देना आवश्यक समझते हैं।
हमारे प्राचीन सद्गुरुओं में योगाभ्यास की बड़ी महिमा वर्णित है। योगाभ्यास से शरीर के समस्त दोष दूर हो जाते हैं। यही नहीं, हमारे प्राचीन साहित्य में तो इस बात तक के प्रमाण मिलते हैं कि हमारे पूर्वज ऋषियों ने मृत्यु तक को, इसी योगाभ्यास द्वारा जीत लिया था। हमारा अतीत इतिहास यह प्रमाणित करता है कि हमारे पूर्वज इच्छानुसार दीर्घायु लाभ करते रहे हैं। आज कल जब कभी हम सुनते हैं कि अमुक पुरुष की आयु सौ वर्ष से अधिक की है तो हमको आश्चर्य सा होता है। पर हम इस बात का विचार नहीं करते कि हमारे पूर्वजों की आयु तो प्रायः सौ वर्ष से ऊपर हुआ करती थी। बात यह है कि हमारे पूर्वज योगाभ्यास करते हुए इच्छानुसार स्वास्थ्य लाभ करते थे। ऐसी दशा में दीर्घायु प्राप्त होना क्या कठिन था ?
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
पातञ्जल योग-सूत्र में योग के आठ अङ्ग बतलाये हैं। यथा— “यमनियमासनं प्राणायाम, प्रत्याहार धारणाध्यान । समाधियोऽष्टावङ्गानि” ॥
अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारण, ध्यान और समाधि। इनमें भी आसन, प्राणायाम, धारण, ध्यान और समाधि ये पांच अंग ही मुख्य माने गये हैं। प्राचीन काल में हमारे देश में थोड़ा बहुत योग का अभ्यास रखने का प्रचलन था। इसी कारण उस काल में हमारे पूर्वज मानसिक और शारीरिक बल प्राप्त करके पूर्ण स्वस्थ रहते और पूर्णायु को प्राप्त होते थे। जिन रोगों पर औषधियाँ काम न देती थीं, योग-साधन से वे उन रोगों से भी मुक्त हो जाते थे। अविद्या से ज्यों ज्यों शनैः शनैः योग-विद्या का लोप होता गया, देशवासियों ने स्वास्थ्य और फलतः दीर्घायु का दिवाला निकाल दिया। आसन और प्राणायाम योग के सब से मुख्य अङ्ग माने गये हैं। कितने खेद की बात है कि इन दोनों के दोनों योग-साधनों का लोप सा हो गया है। अनेक धार्मिक सज्जन महानुभाव प्राणायाम तो येन केन प्रकारेण कर भी लेते हैं, पर योगासनों का तो सर्वथा लोप हो गया है। पर प्राणायाम आत्म-शुद्धि के लिए जितना आवश्यक है, योगासन शारीरिक विकास के लिए उससे भी अधिक उपयोगी है। कहा भी है—
“आसनानि समस्तान, सावन्तो जीव जन्तवः चतुरशीति लक्षाणि, शिवेनकथितंपुरा ॥
योगासनों का अभ्यास शौच, स्नान, व्यायाम आदि से निपट कर बिना कुछ खाये-पिये, प्रातःसायं ऐसे स्थान पर करना चाहिये,
❁ सिद्धासन ❁
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जहाँ शुद्ध वायु विपुलता से आती हो और प्रकाश भी पर्याप्त हो। यों तो योगासन अगणित हैं। योनियों की संख्या चौरासी लाख है। योनियों की संख्या के अनुसार ही चौरासी लाख योगासन योगिराज भगवान् शङ्कर ने बतलाये हैं; पर उनमें चौरासी मुख्य हैं। योगी और महात्मा लोग इन चौरासी आसनों का अभ्यास करते हैं। पर साधारण जीवन में ब्रह्मचर्य्य ब्रत पालन के लिए इन सभी आसनों का प्रयोग आवश्यक नहीं है। इस लिए हम यहाँ पर उन्हीं मुख्य आसनों का वर्णन करेंगे, जिनसे ब्रह्मचर्य्य-रक्षा में अपेक्षित सहायता मिल जाती है।
(१) सिद्धासन
पहले पलथी मारकर बैठ जाइये। फिर बाँये पैर की एड़ी को गुदा और अण्डकोपों के मध्य में, मज्जवृत्ती के साथ जमा दीजिये इसके बाद दाहिने पैर की एड़ी को लिंग के ऊपर, मूल में, जमा दीजिये। ठोड़ी को हृदय में, अर्थात् कंठमूल से थोड़ी दूर लगाइये और स्थिर होकर शरीर को सीधा कीजिये, फिर भौहों के मध्य में दृष्टि को ऐसा स्थिर कीजिये कि पलक और नेत्र विलकुल हिल-डुल न सकें। हाथों को घुटनी पर रख लीजिये। दोनों पैर एक दूसरे पर इस तरह आ जाने चाहिये कि दोनों की संधि-स्थान की हड्डियाँ ठीक एक दूसरे पर आ जायँ। इस समय श्वास-प्रहरण और श्वास-त्याग की क्रियायें बहुत धीरे-धीरे शान्ति के साथ होनी चाहिये। इस आसन का अभ्यास करते समय इस बात का ध्यान
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
रखना आवश्यक है कि पीठ की रीढ़ सीधी रहे। पीठ की रीढ़ में शरीर की सारी नसें फैली हुई हैं। इसी को मेरुदंड कहते हैं। शरीर का यही मूलाधार है। साधारण रूप से चलते फिरते समय भी इसको सीधा रखना चाहिये।
यह आसन एक मास के निरन्तर अभ्यास से लाभप्रद सिद्ध होता है। पर इस आसन का अतिशय अभ्यास हानिकारक भी होता है क्योंकि यह आसन कामोत्तन का नाशक है। अतिशय अभ्यास से इसका प्रभाव सन्तानोत्पादन शक्ति को इतना क्षीण बना देता है कि काम बिल्कुल शान्त पड़ जाता है। और पुरुष स्त्री के काम का नहीं रह जाता। पर इस भय से इस आसन का करना ही स्थगित कर देना ठीक नहीं है। ब्रह्मचर्य के लिए यह आसन अतीव लाभकर है। अंति तो सर्वत्र और सर्वदा वर्जित है। इसलिए इसका थोड़ा अभ्यास अवश्य रखना चाहिये।
(२) पद्मासन
इस आसन में भी पहले पलथी मारकर बैठ जाइये, फिर दाहिने पैर को बाईं जाँघ पर और बायें पैर को दाहिनी जाँघ पर जमा दीजिये। फिर बायां हाथ बायें घुटने पर और दाहिना हाथ दायें घुटने पर रखिये। इस आसन में पीठ, गला, स्तर, रीढ़ बिल्कुल सीध में होनी चाहिये। अपनी दृष्टि को भौहों के बीच या नासिका पर लगा देना चाहिये।
❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
चित्र नम्बर १
A black and white line drawing of a man sitting cross-legged in a meditative posture. He is shirtless and wears a beaded necklace. His hands are clasped together in his lap. He has a mustache and a small crown-like headpiece. The drawing is simple and stylized.
सिद्धासन
❁ प्रहसचर्य ही जीवन है ❁
चित्र नम्बर २
जानुशिरासन
❁ जानु शिरासन ❁
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(३) जानु शिरासन
इस आसन में पहले दोनों पावों को जमीन पर समान रेखा में फैला दीजिये। पाँव जमीन से इस तरह चिपके रहने चाहिये कि बिल्कुल उठ न सकें। इसके बाद किसी एक पैर को गुदा और अण्डकोण के बीच में लाकर उसकी एड़ी को वहाँ इस तरह जमा दीजिये कि उस पैर का पंजा और तलवा दूसरे पैर के जंघा से बिल्कुल चपक जाय। और उसका दबाव भी बराबर पड़ता जाय। इसके बाद दोनों की कैंची बनाकर उन्हें फैले हुए पैर के तलबे के यहाँ ले जाइये। और उस पैर को इस तरह पकड़ लीजिये कि आपकी नाक ठीक उसी पैर के घुटने के ऊपर आ जाय। यह आसन पाँच मिनट से लगाकर आध घंटे तक, या जैसी सामर्थ्य हो, उसके अनुसार करना चाहिये।
यह आसन यदि पहले दाहिने पैर से कीजिए, तो फिर बायें पैर से। इसी तरह बदलते रहिये। इसमें भूल नहीं होनी चाहिये। भूल होने से हानि होगी। बात यह है कि दोनों पैरों का अभ्यास बराबर होना चाहिये। इसमें प्रत्येक बार समय भी समान लगना चाहिये।
यह आसन स्त्रियों के लिए नहीं है।
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
(४) पादांगुष्ठसन
इस आसन में किसी एक पैर की गेंड़ी को गुदा और अंडकोप के मध्यभाग में लगाकर शरीर के समस्त भार को उसी पर छोड़ दीजिये। दूसरे पैर को घुटने के ऊपर रखिये। अगर सहारे की आवश्यकता हो तो या तो एक हाथ का सहारा लीजिये, या दीवार का।
इस आसन का प्रभाव बहुत शीघ्र होता है। इसके अभ्यास से कैसा ही स्वप्रदोष हो दूर हो जाता है। पर इस आसन को ब्रह्मचारी ही को करना चाहिये। गृहस्थों के लिए इसका निरन्तर अभ्यास करना विशेष हितकर न होगा। स्त्रियों के लिए यह आसन वर्जित है।
(५) शीर्षासन
इस आसन में सिर के बल खड़ा होना होता है। इसलिए या तो एक गढ़ेला रख लेना चाहिये, या किसी वस्त्र की ऐसी गिंड़ई बना लेना चाहिये जो सिर के बल खड़े होने में सहायक हो। मतलब यह है कि इस आसन के समय सिर के नीचे सख्त जमीन नहीं होनी चाहिये। सख्त जमीन होने से मस्तिष्क पर दुष्प्रभाव पड़ने का भय रहता है। इसलिये यही अच्छा है कि इसका आसन बहुत मुलायम और गुदगुदे धरातल में करें। आरम्भ में यह आसन दीवाल का सहारा लेकर किया जाता है। अगर इस आसन को
❁ अन्नचर्यं ही जीवन है ❁
चित्र नम्बर ३
पादांगुष्ठासन
❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
चित्र नम्बर ४
१ आसन ४
इस आसन में तो एक गढ़ेला रख ले बना लेना चाहिये जो मतलब यह है कि इस नहीं होनी चाहिये। सख्त का भय रहता है। इसलि मुलायम और गुदगुदे धर दीवाल का सहारा लेकर।
शीर्षासन
❁ शीर्षासन ❁
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करते समय प्रारम्भ में मित्रों से सहायता ली जाय तो भी अच्छा है।
इसमें पहले सिर को गढ़ले या गिंडुई में रखकर दोनों हाथों की कैंची बना कर सिर को अच्छी तरह साध लीजिये। फिर दोनों पैर को जमीन से बहुत धीरे धीरे उठाकर ऊपर आकाश में सीधे ले जाइये। पैरों को विलकुल सीधा रखिये।
इस आसन को पहले १०-१५ क्षणों से प्रारम्भ करना चाहिये। छः मास के अभ्यास के अनन्तर इसे आध घंटे तक लगाया जा सकता है। पर एक घंटे से अधिक इसे न करना चाहिये। इस आसन के कर लेने पर न तो लेटना चाहिये और न बैठना। जितनी देर इस आसन में लगी हो, उतनी ही देर विलकुल सीधा खड़ा रहना चाहिये। बात यह है कि इस आसन से शरीर की नसों का रुधिर-प्रवाह पहले थोड़ा रुकता है और फिर उल्टा प्रवाहित होने को होता है। इसमें मस्तिष्क को खूराक मिलती है और दिमागी ताकत बढ़ जाती है। जिस समय यह आसन किया जाता है उस समय मुँह एक दम लाल हो जाता है।
पहले तो यह आसन दीवाल के सहारे से ही प्रारम्भ होता है; फिर जब दीवाल के सहारे से इस आसन को करते हुए एक मास तक अभ्यास कर ले, तब बिना किसी का आश्रय लिए करना चाहिये। यह आसन शरीर के समस्त विकारों को नाश करता है। तरुणावस्था में जिन लोगों के बाल सफेद हो जाते हैं, यदि वे इसका छः मास भी अभ्यास करें तो उनके बाल फिर काले हो जायेंगे।
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
विशेष सूचनाएँ
१—इन योगासनों का अभ्यास करते समय लघुपाक आहार अत्यन्त आवश्यक है। कंद, मूल तथा फलों का ही आहार किया जाय तब तो बहुत ही अच्छा हो, पर साधारण रूप से गौ का दूध, चावल, खिचड़ी, दलिया, गेहूँ के मोटे आटे की रोटी, मूँग की दाल देशी सक्कर, सायूदाने की खीर, सूखी मेवा तथा हरे फल खाने चाहिये।
२—इन आसनों की जो विधियाँ ऊपर बतलायी गई हैं वे यद्यपि कुछ बहुत कठिन नहीं हैं, तथापि बिना किसी अभ्यस्त शिक्क के इनका अभ्यास करने से लाभ के बदले प्रायः हानि भी हो जाती है। इसलिए इन्हें शिक्क या योगी से ही सीखना चाहिये।
३—इन आसनों का अभ्यास करते समय आस का निकालना और ग्रहण करना—ये दोनों क्रियायें बहुत धीरे धीरे होनी चाहिये।
४—यदि शरीर में वीर्य-सम्बन्धी कोई विकार हो तो इन आसनों का अभ्यास करते समय गुदा-संकोचन पर विशेष ध्यान रखना चाहिये। वीर्य-रक्षा का यह एक मात्र अन्यर्थ-महौषध है।
५—जो लोग विधिवत् ब्रह्मचारी नहीं हैं; अर्थात् जिनका विवाह हो गया है, वे भी इनका अभ्यास करके अपने शरीर को नीरोग बना सकते हैं। पर इन आसनों का अभ्यास करते समय हृद संयम के साथ वीर्य-रक्षा करना अनिवार्य रूप से आवश्यक है।