भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

“नियम नियमावली का पाठ”

नियम पचीसवाँ :—

रोज़ प्रातः इस ब्रह्मचर्य की नियमावली का अवलोकन व पठन करना कभी न भूलना चाहिये; क्योंकि इसी में ब्रह्मचर्य रक्षा का सार है—इसीमें चैतावनी है इसीमें ब्रह्मचर्य के संस्कार हैं। नियमावली को एक बार ‘प्रातःकाल में रोज़ देखो ? बहुत उपकार होगा। हम विश्वास दिलाते हैं कि यह आपका “नियम दर्शन वा पठन कभी निष्फल नहीं होगा,” तुम्हें वह अवश्य वलपूर्वक सन्मार्गपथ पर घसीट कर ले आवेगा। इतना ही नहीं बल्कि यदि कोई इस नियमावली का सतत एक वर्ष तक पाठ शुरू रखेगा तो उसमें क्या ही ऊँचे भाव पैदा होंगे इसका खुद उसी को अनुभव हो जावेगा, हाथ कंगन को आरसी क्या ? हम प्रतिज्ञापूर्वक कह सकते हैं कि यह पचीस नियम वा ‘ब्रह्मचर्य-नियम पचीसा’ मुद्दे को भी चैतन्यमयी बना सकता है ! वस ! इससे अधिक क्या कहें ! स्वयं अनुभव कीजिये ! ॐ ! इति !

१६—सम्पूर्ण सुधारों का दादा ब्रह्मचर्य

आजकल देश भर में शूरों की सेना बढ़ रही है। जिसे देखो वही व्याख्यानदाता और देशसुधारक बनता फिरता है। इधर-उधर मण्डूकमंडली का टर्न टर्न कोलाहल सुनाई दे रहा है। कागजी घोड़ों के खुरों की खनखनाहट जोर शोर से कानों में घुस रही है।