ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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ऐसा मालूम होता है मानों अब कोई बड़ा भारी कर्मवीर हमारी सहायता करने के लिये आ ही रहा है ! परन्तु देखते हैं क्या : “कुछ नहीं !” कोई देशभक्ति के बहाने, कोई देशकार्य के बहाने, कोई समाजस्थापन के बहाने, अपना अपना स्वार्थसाधन कर रहे हैं । कोई ऐसे उदार पुरुष हैं, कि विना पैसे लिये व्याख्यान ही नहीं देते ? भला ऐसे देशभक्तिशून्य वाक्य पंडितों से देश का क्या सुधार हो सकता है ? केवल बातों के लड्डुओं से कौन घृत हो सकता है ? हमें ऐसे/प्रत्यक्ष निःस्वार्थी कर्मवीरों की बड़ी भारी आवश्यकता है, जिनके केवल मुख ही नहीं, बल्कि संपूर्ण शरीर ही हमारे सच्चे कर्तव्य की हमें सच्ची शिक्षा दे सकते हैं । एक आदर्श पुरुष देश का जितना सुधार कर सकता है, उस सुधार का एक सहस्रांश भी सुधार हजारों निर्वीर्य वाक्यपंडित अपने आयु भर के कोरे व्याख्यानों से नहीं कर सकते ! व्याख्यानवाजी से कोई कदाचित् समझता हो कि भारत अब जाग उठा है, तो यह उसकी गलती है । भारत जैसा पहले था वैसा ही आज भी है; हिन्दुस्तान पहले की तरह आज भी ठण्डा ही है । विशेष फ़रक हुआ है सो यही कि वह पहले से आज अधिक बढ़बढ़ करने लगा है । भारत में प्रत्यक्ष निःस्वार्थी कर्मवीर बहुत ही कम दिखाई देते हैं; स्वयं दुराचारी, अत्याचारी व दम्भी होने पर भी अपने को सदाचारी और ब्रह्मचारी समझना तथा लोगों के नेता होने का दम भरना, इससे सुधार तो नहीं बल्कि भारत का विगाड़ ही अधिक हुआ है और होता है । वगैर नीतिवल के—चारित्र्यवल के—कोई पुरुष कदापि श्रेष्ठ व यशस्वी हो ही नहीं सकता, यह अटल सिद्धान्त है । और नीतिवल, चारित्र्यवल किंवा आत्मवल, विना ब्रह्मचर्य के धारण