भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ सादा व ताप्ता अल्पाहार ❁

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खाते खाते ही मर जाते हैं। पेट्ट मनुष्य सदा दुःखी, आलसी, रोगी और अल्पायु बना रहता है। देश में जब कोई रोग फैलता है, तब पेट्ट मनुष्य सब से पहले काल का शिकार बन जाता है और इस बात का अनुभव हैजा के दिनों में प्रत्यक्ष होता है। हैजा की बीमारी सब से पहले अधिक भोजन करने वालों ही को होती; है केवल अल्पाहारी पुरुष ही बच सकते हैं। अतः सज्जनों ! अधिक भोजन करना—परोपकार के लिये नहीं तो स्वार्थ के लिये अर्थात् अपने उद्धार के लिये—अवश्य छोड़ दो। सिर्फ जितना पचा सकते हो उतना ही खाओ, इससे एक भी फ़बर ज्यादा खाना मानो अपनी आयु का एक एक दिन कम करना और अकाल में काल के मुँह में जाना है। श्री मनु महाराज कहते हैं:—

अनारोग्यं अनायुष्यं अस्वर्ग्यं घाडतिभोजनं ।

अपुण्यं लोकविद्विषं तस्मात्तपरिवर्जयेत् ॥

“अति भोजन रोगों को बढ़ाने वाला, आयु को घटानेवाला, नरक में पहुँचाने वाला, पाप को कराने वाला और लोगों में निन्दित करने वाला है ( यानी फलों मनुष्य बड़ा पेट्ट है इस प्रकार की बढ़नाभी करने वाला है ) अतः बुद्धिमान् को चाहिये कि किसी बढ़िया पदार्थ के फेर में पड़ कर, जरूरत से अधिक कदापि न खाये ! क्योंकि वैसा करना पूर्ण अघर्म है। पेट्ट मनुष्य आत्म हत्यारा कहा जाता है। पेट्ट मनुष्य की धर्म-बुद्धि विलकुल नष्ट हो जाती है और वह हठात् पापकर्मों में प्रवृत्त होता है। संपूर्ण पाप की जड़ अधिक भोजन करना ही है। अधिक भोजन ही से काम, क्रोध रोगादि अधिक प्रबल बन जाते हैं और