ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ महत्त्वपूर्ण ही जीवन है ❁
चाहिये । “भोजन तारता भी है और मारता भी है ।” अधिक भोजन से मनुष्य जीते जी ही सुर्दी और बेकार बन जाता है । भक्तदास वामन कहते हैं:—
“ज्यादा घायु भरनसे, फूटवाल फट जाय ।
घड़ी कृपा भगवान् की, पेट नहीं फट जाय ॥१॥
“यदपि न दीखत पेट फटा, फटत मनुज का देह ।
रोग भयंकर होता है, धने नरक का गेह” ॥२॥
अतः तन्दुरुस्ती के लिये खाओ; रोगी बनने के लिए मत खाओ । जो कुछ खाओ जीने के लिए खाओ, मरने के लिये मत खाओ । बहुत भोजन करने वाला बहुत जल्द मरता है । अमेरिका के सुप्रसिद्ध डाक्टर म्याक्क्याडन कहते हैं:—“आजकल साधारणतः लोग भोजन के वहाने जितने पदार्थों का सत्यानाश करते हैं उनके चतुर्थीश से ही उनका काम बड़े आनन्द से चल सकता है । अकाल में अन्न के अभाव से लोग उतने नहीं मरते, जितने कि सुकाल में अधिक अन्न खाने से तरह तरह के रोगों से मर जाते हैं ।” देश में दुष्काल भी पेटू लोगों की ही कृपा से पड़ता है । अतः पेटू मनुष्यों को स्वयं अपना तथा देश का भी वैरी समझना चाहिये ।
अरेरे ! गरीब लोग बेचारे भोजन न मिलने से मरते हैं और धनी तथा पेटू लोग अधिक खाने से मरते हैं, केवल मध्यम प्रकार के मिताहारी पुरुष ही ब्रह्मचारी और दीर्घजीवी हो सकते हैं । देश में प्लेग, कालरा भी पेटू लोगों के ही कारण होते हैं, क्योंकि पेटू मनुष्य बहुत गन्दे होते हैं । कमाना, खाना और पाखाना ये ही उनके इस संसार में के तीन मुख्य काम होते हैं और अन्त में वे