ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❁ सादा व ताजा अल्पाहार ❁
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पैट्ट मनुष्य को पटक पटक कर मार डलता है। अधिक भोजन करने वाला पुरुष किसी हालत में वीर्य को नहीं रोक सकता। उसका चित्त सदा विषय की ओर लगा रहता है। मन और तन दोनों रोगी बन जाते हैं, आयु घट जाती है और स्वार्थ व परमार्थ दोनों मटियामेट हो जाते हैं। स्वप्नदोष अक्सर अधिक भोजन ही से हुआ करता है। यदि आप को वीर्यवान व आरोग्यवान् बनना हो, स्वप्नदोष से और अकालमृत्यु से बचना हो तो आपको अवश्य ही सदा और अल्पाहारी बनना होगा।
एक समय ईरान के बादशाह वहमन ने एक श्रेष्ठ वैद्य से पूछा “दिन-रात में मनुष्य को कितना खाना चाहिये ?” उत्तर मिला “सौ दिरम अर्थात् ३९ तोला ।” फिर पूछा, “इतने से क्या होगा ?” हकीम बोला, “शरीर-पोषण के लिये इस से अधिक नहीं चाहिए। इसके उपरान्त जो कुछ खाया जाता है वह सिर्फ वीभ ठोना और उम्र को खोना है।
यह सिद्धान्त है कि आहार, निद्रा, भय, मैथुन, क्रोध, कलह आदि बातें जितनी बढ़ाई जायँ उतनी ही बढ़ती जाती हैं और जितनी कम की जायँ उतनी कम होती जाती हैं। भगवान् बुद्ध कहते हैं:—“एक बार हलका आहार करने वाला “महात्मा” है; दो बार सम्हल करके खाने वाला बुद्धिमान् व भाग्यवान् है; और इससे अधिक वे अटकल खानेवाला महामूर्ख, अभागा और पशु का भी पशु है ।” सच है, गले तक खूब दूस दूस करके खाना और फिर पछताना कौन बुद्धिमान् है ? ये क्या भाग्यवान् के लक्षण हैं ? भोजन सुख के लिए खाया जाता है या दुःख के लिए ? जिस भोजन से दुःख उपजता है उस भोजन को विष तुल्य ही समझना
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