भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁

और सब बातों में तेजस्वी दिखाई देते हैं ! परन्तु हम लोग, उन्हीं के भाई, मुर्दों के समान निर्बिध गोबरगणेश दिखाई दे रहे हैं । यह कितने शोक और लज्जा की बात है ? अब हमें अवश्य ही जागना चाहिये और हमेशा उन्नतिमद काम करने चाहिये । सब उन्नति का मूल शरीर है । अतः उसे पहले सुधारना चाहिये । योही हाथ बुमाने से जैसे फोड़े वर्तन ( पात्र ) साफ नहीं हो सकता, उसे जोर से ही रगड़ना पड़ता है, तद्वत् शरीर रूपी वर्तन भी, वगैर धर्पण-स्नान के बाहर भीतर से साफ और चमकीला नहीं हो सकता । काफ-स्नान से मनुष्य सदा रोगी, मलीन, आलसी, विपथी, निस्तेज और अल्पशु होता है । परन्तु वही मनुष्य यदि धर्पण-स्नान आज ही से शुरू कर दे, तो थोड़े ही दिनों में पूर्ण निरोगी, निर्निर्काशी, उत्साही व तेजस्वी बन सकता है । ब्रह्मचर्य तथा दीर्घ जीवन के लिये धर्पण-स्नान अत्यन्त आवश्यक और अमृत तुल्य है ।

“सादा व ताजा अल्पाहार”

नियम सातवां :—

वक्तव्यः—ब्रह्मचर्य और भोजन में अत्यन्त घनिष्ठ संबंध है । भोजन के महत्व को बहुत लोग नहीं जानते, इस कारण उन्हें अत्यन्त दुःख उठाना पड़ता है । जिसे ब्रह्मचारी बनना है, उसको सादा और अल्पाहारी अवश्य ही बनना होगा । अधिक भोजन करने वाला सात जन्म में भी ब्रह्मचारी नहीं हो सकता । क્યાंकि जोर की आँधी जैसे पेड़ों को उखाड़ डालती है, वैसे ही कामदेव