ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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तैरना नियमपूर्वक होना चाहिये; तैरना अपने और दूसरों की प्राण रक्षा के लिये एक बहुत ही अच्छी कला है। क्या डूबते समय हमारी किताबें काम देंगी ? कदापि नहीं। अतः इस हुनर को स्वास्थ्य की दृष्टि से हर किसी को अवश्य सीख लेना चाहिये (५) स्नान भोजन के पहले वा बाद में तीन घंटे के अन्तर पर करना चाहिये। नहाने के बाद तुरन्त भोजन करने से अथवा भोजन के बाद तुरन्त नहाने से पित्त बढ़ जाने के कारण पाचन-क्रिया विगड़ जाती है जिससे कि रोग व मानसिक विकार उत्पन्न होते हैं। अतः एव सावधान रहो। (६) रोगा, दुर्बल, वा नाजुक मनुष्य को हफ्ते में ताजा ठण्डे पानी से जरूर नहाना चाहिये और बहुत धीरे धीरे ठण्डे जल से नहाने का अभ्यास डालना चाहिये। (७) तौलिया से रगड़ने और थोड़ी सी कसरत करने पर भी यदि बहुत ही जाड़ा मालूम होता हो, हमें स्नान हरगिज न करना चाहिये (८) स्नान के लिये जगह एकान्तपूर्ण, खुली हवादार, प्रकाशमय होनी चाहिये, स्नान के समय शरीर पर जितने ही कम कपड़े होंगे उतना ही अच्छा है, क्योंकि खुले शरीर पर सदी गर्मी असर नहीं कर सकती। लंगोट पहिन कर नहाना बहुत अच्छा है; घर पर एकान्त में विवस्त्र नहाना सबसे अच्छा है, जलाशय में नहीं। यद्यपि नंगा नहाना पश्चात्यों ने पसन्द किया है तथापि वह भारतीय सभ्यता के सर्वथा विरुद्ध है, भारतीयों के लिये लंगोट सहित नहाना ही सर्व श्रेष्ठ है। (९) वीर्यपात होने के बाद तुरन्त नहा लेना चाहिये।
जापानी लोग धर्पण-स्नान का महत्त्व भोजन से भी अधिक मानते हैं और इसी कारण आज वे इतने उत्साही, उद्योगी, दीर्घायु