भारतकोश
ब्रह्मचर्य ही जीवन है

ब्रह्मचर्य ही जीवन है

Brahmacharya Hi Jeevan Hai

स्वामी शिवानन्द द्वारा

स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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घर्षण-स्नान ही है। यदि एक ही दिन में घर्षण-स्नान से मनुष्य में इतना आनन्द, उत्साह आरोग्य, शान्ति व कान्ति दिखाई देती है, तो नित्यप्रति इस प्रकार विधिपूर्वक घर्षण-स्नान करने से मनुष्य का आनन्द, उत्साह, आरोग्य शान्ति व कान्ति और भी अधिक बढ़ेगी इसमें सन्देह ही क्या है ?

स्नान के कुछ शास्त्रीय नियम—( १ ) रोज दो मरतवे स्नान करना अच्छा है। गर्मी के दिनों में तो हमको दो मरतवे स्नान करना ही चाहिये। क्योंकि दिन भर के पसीने के कारण शरीर से बड़ी ही वद्वू निकलने लगती है। पसीने में बहुत ज़हर होता है, यह बात ध्यान में रखो। ( २ ) महीने में एक मरतवे गर्म पानी और साबुन या सोड़ा से नहाना बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद होता है, त्वचायें और भी साफ हो जाती हैं। परन्तु रोज गर्म पानी से नहाना अच्छा नहीं है। यह अप्राकृतिक है। उससे मनुष्य कमज़ोर नाजुक, चंचल व विषयी बन जाता है। नित्य गर्म पानी से नहाना ब्रह्मचर्य के लिये बहुत ही हानिकर है। ( ३ ) नदी और तालाब का स्नान और भी अच्छा होता है। शास्त्र में समुद्र-स्नान की महिमा सब से अधिक है क्योंकि समुद्र जल में एक प्रकार की विजली होने के कारण मनुष्य अधिक निरोग और चैतन्यमय बन जाता है। यदि घर के पानी में भी समुद्र का नमक मिलाकर स्नान किया जाय तो उससे भी विशेष फायदा होता है। बाद में शुद्ध जल से स्नान कर लेना चाहिये। ( ४ ) तैरने में बहुत से लाभ हैं। तैरने में सभी अवयवों को व्यायाम होता है, सीना पुष्ट और विस्तीर्ण होता है, फेफड़े शुद्ध और वलवान होते हैं और सम्पूर्ण शरीर निरोग, फुर्तीला, सुदृढ़, दमदार, उत्साही और शक्तिशाली बनता है। परन्तु

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