ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❁ घर्षण-स्नान ❁
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स्नान के लिये बैठने पर गर्दन मुकाकर सब से पहिले एक-दो लोटे जल से शिर भिगोओ । यदि मस्तिष्क प्रथम न भिगोया जाय तो नीचे की तमाम गर्मी दिमाग में चढ़कर बड़ी ही हानि करेगी, स्मरणशक्ति नष्ट कर देगी, आँख की ज्योति विगाड़ देगी, मन में काम विकार प्रबल होंगे और स्वास्थ्य भी नष्ट हो जायगा । इस ही कारण “न च स्नायाद्विनाशिरः ।” सब से प्रथम बिना शिर को भिगोये व धोये स्नान कदापि न करना चाहिये, ऐसी सूत्रमय शाखाशा है । इस शास्त्र-हृत्स्य को न जानने से कारण ही, आज न मालूम कितने ही लोगों को मुफ्त में रोगी और अल्पायु बनना पड़ता होगा । अतएव सावधान रहो । गला, शिर भिगोने के बाद फिर गार के रक्खे हुये तौलिये से क्रमशः हाथ ! कंधे, सीना, पेट, पीठ, कमर, टाँग, पैर वगैरह खूब रगड़ो । फिर शिर पर से सम्पूर्ण शरीर भर में यथेष्ट पानी उड़ेलिये । हाथ से सब अंग फिर से रगड़ो । फिर शरीर भर में पानी उड़ेलो तत्पश्चात् सूखे तौलिया से सम्पूर्ण शरीर को पोंछ डालो । ( शरीर को साफ न पोंछने ही से गीलापन के कारण मनुष्य को अक्सर दाढ़, खुजली वगैरह हुआ करती है और खुजलाते खुजलाते अनेकों लड़कों को बुरी आदतें लग जाती हैं ) फिर धोती याँ ही लपेट कर खुली प्रकाशमय जगह में सूर्य-स्नान अर्थात् सूर्य के किरण शरीर पर लेते हुये थोड़ी देर इधर-उधर टहलो । शरीर पूरा सूख जाने के बाद फिर धोती पहन कर अपने धन्धे में लग जाओ । देखो, एक ही दिन के ‘घर्षण स्नान’ से आपके शरीर में क्या ही उत्साह, आनन्द, फुर्ती और कान्ति दिखाई देती है ! हमारा मुख अन्य भव अवयवों की अपेक्षा जो इतना सुन्दर और तेजस्वी दिखाई देता है, इसका मुख्य कारण