ब्रह्मचर्य ही जीवन है
Brahmacharya Hi Jeevan Hai
स्वामी शिवानन्द द्वारा
स्रोत: Chatra Hitkari Pustakmala, Daraganj, Prayag (1926) · Kedarnath Gupta, Chatra Hitkari Pustakmala · 1926 (उद्गम)
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❁ ब्रह्मचर्य ही जीवन है ❁
है और आलस्य नष्ट होकर सम्पूर्ण शरीर चैतन्यमय बन जाता है। अतएव स्नान सूर्योदय के पहले ही कर लेना चाहिये, जाड़े और वरसात में ८-१० या १५ मिनट और गर्मी में पूरा आधा घण्टा तक, जब तक कि मस्तिष्क पूरा ठण्डा न हो तब तक स्नान अवश्य करना चाहिये। स्वप्न-द्रोप से पीड़ित मनुष्य को तो शाम को भी दुबारा नहाना चाहिये। जहाँ तक हो, ताजा और स्वच्छ शीतल जल मस्तिष्क पर खूब डालना चाहिये। स्नान के लिये कूप का जल सब ऋतुओं में अनुकूल होता है; जाड़े में गर्म और गर्मी में सर्द होता है। स्नान से लिये कूप में से जल अपने ही हाथ खींचो उससे सीना और दण्ड पुष्ट हो जाते हैं। जाड़े में स्नान के पहले १०-१२ दण्ड और २५-३० बैठक लगा लेने से जाड़ा नहीं मालूम होगा। परन्तु वर्षण-स्नान में जोर से रगड़ने से जो कुछ व्यायाम होता है, उससे शरीर में काफ़ी गर्मी आ जाती है। स्नान के लिये पानी सदा ताजा, स्वच्छ व विपुल रहे, इस बात का स्मरण रहे। स्नान के पहले सब शरीर को सूखे तौलिया से व खुरखुरे बल्ब से (मुलायम से नहीं) खूब जोर से रगड़ो; रगड़ने में कुछ कमी न करो और कुछ डरो भी मत। पर हाँ उचित जगह पर उचित जोर लगाओ, नहीं तो मारे रगड़ो के आँख ही फोड़ लोगे। तौलिया से रगड़ने के बाद हाथ से रगड़ो। हाथ के रगड़ने से शरीर में एक विजली पैदा होती है। जो कि शरीर के तमाम रोगों को हटाती है। इस कारण शरीर का प्रत्येक अवयव अच्छी तरह से रगड़ना चाहिये। जहाँ संधर्षण न होगा उतनी ही जगह कमजोर और रोगी बनी रहेगी, यह बात ध्यान में रखो। पेट को ठीक रगड़ने से पेट के अनन्त विकार नष्ट होते हैं और पाखाना भी सांफ़ होता है।